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आँकड़ों के खेल पर एक नज़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्वास मत का दिन जैसे जैसे क़रीब आता जा रहा है वैसे वैसे सरकार और उनके विरोधी दोनों के दिलों की धड़कनें तेज़ होती जा रही हैं. हालांकि दावा तो दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी संभावित जीत का कर रहे हैं, लेकिन आँकड़ों के इस खेल में आख़िरकार ऊंट किस करवट बैठेगा ये कहना बहुत मुश्किल है. संसदीय प्रणाली में सरकार का विश्वास मत हासिल करना या विपक्ष का सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाना ये कोई नई बात तो है नहीं, तो फिर आख़िर इस बार ऐसा क्या है की हर कोई ये जानना चाहता है की 22 जुलाई को क्या होगा? एक वजह तो शायद ये हो सकती है की वर्ष 1999 में वाजपेयी सरकार के एक मत से गिरने के बाद आम आदमी भी इस तरफ़ थोड़ा आकर्षित हो जाता है. सांसदों की ख़रीद फरोख़्त के आरोप, क्षेत्रीय राजनीति के अपने समीकरण, सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद के ख़तरे और उनसे लड़ने के अपने-अपने दावे सभी कुछ चर्चा में है. तो क्या 543 सांसदों वाली लोक सभा में सत्ताधारी पक्ष यानी यूपीए 272 का जादुई आँकड़ा पाने में कामयाब होगी या विरोधियों का दावा सही साबित होगा. ज़ाहिर है नेताओं की तरह हम दावा तो नहीं कर सकते लेकिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया के राजनीतिक संपादक दिवाकर के मुताबिक फिलहाल यूपीए का पलड़ा भारी है. किसका पलड़ा भारी वे कहते हैं, "इनके पास रेवाड़ियां होती हैं उनके पास प्रलोभन होता है. उनमें तात्कालिकता होती है जबकि विपक्ष का प्रलोभन भविष्य के लिए होता है जिसकी विश्वसनीयता नहीं होती है इसलिए सत्तारूढ़ पक्ष को हमेशा बढ़त रहती है और कांग्रेसी इसके पुराने खिलाड़ी हैं वो इस अखाड़े के पुराने पहलवान रह चुके हैं. भाजपा एक वोट से ज़रूर हार गई थी लेकिन कांग्रेस अगर तीन वोट से भी हार रही होगी तो मतदान के दिन उसके जीतने की संभावना ज़्यादा होगी." 272 के जादुई आँकड़े की राह में 250 या यूँ कहें की 260 तक तो दोनों ही पक्षों को दिक्कत नही है मसला तो सिर्फ़ 10-15 सीटों का है जो खेल बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं. अब देखिए कांग्रेसी चाहे ऊपर से जो बोलें लेकिन अंदर ही अंदर थोड़ी ही सही लेकिन एक उम्मीद तो थी ही की सिख प्रधानमंत्री के नाम पर शायद अकालियों से कुछ फ़ायदा हो जाए. उनके कुछ नेता पंजाब को बिजली की ज़रूरत बताकर ऐसा माहौल भी बना रहे थे. उनकी सारी उम्मीदों पर पानी तब फिर गया जब पंजाब के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल ने लोकसभा में अकाली दल के एनडीए के साथ मतदान करने की घोषणा कर दी. जम्मू कश्मीर की पीडीपी ने ग़ुलाम नबी आज़ाद की सरकार को गिरा दिया हो लेकिन केंद्र में उनकी सांसद महबूबा मुफ्ती ने यूपीए का साथ देने की घोषणा कर दी है.
अब ऐसे में भला नेशनल कान्फ्रेंस के लिए मुश्किल तो होगी ही. वो हांलाकि पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के करीब दिख रहे हो लेकिन राज्य में तो पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस एक साथ नहीं हो सकती. शायद इसीलिए उन्होंने फ़ैसला टाल दिया है. अब इसको भी दोनों ही गुट अपनी तरह से देख रहा है. तीन सांसदों वाली टीआरएस ने यूँ तो साफ़ कह दिया है कि वोट लेना है तो तेलंगाना राज्य दो लेकिन 22 जुलाई को वो क्या करेंगे ये तो वही बता सकते हैं. 5 सांसदों वाली झारखण्ड मुक्ति मोर्चा यूं तो यूपीए की सहयोगी है लेकिन समर्थन पर फ़ैसला 19 को करेंगे क्योंकि अब उनकी भी अपनी कुछ मांगे हैं. या तो उनके नेता गुरूजी यानी शिबू सोरेन को केन्द्र में मंत्री बनाया जाए या झारखण्ड का मुख्यमंत्री. अब ऐसे में उनको कौन बताए कि प्रधानमंत्री भला 22 जुलाई से पहले तो केवल आश्वासन ही दे सकते हैं लेकिन हम सभी जानते हैं की झामुमो के नेता आश्वासन से नहीं मानते. उन्हें तो कुछ ठोस चाहिए . तीन सांसदों वाली जेडी (एस) के एक सांसद ने तो साफ़ कह दिया है की वो सरकार के ख़िलाफ़ वोट डालेंगे . पार्टी प्रमुख देवगौड़ा यूँ तो धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक साथ लाने की बात कह रहे हैं लेकिन उनकी बात पर भरोसा भला ये कौन करेगा . वही हाल तीन सांसदों वाली आरएलडी की है . अजित सिंह ने हांलाकि परमाणु समझौते को राष्ट्र हित में बताकर कांग्रेसियों को उम्मीद तो बंधा दी है लेकिन समर्थन पर अभी तक अन्तिम फ़ैसला नहीं, मतलब साफ़ है समर्थन तो करेंगे लेकिन पूरी कीमत भी लेंगे. कितनी कीमत वैसे भी सांसदों की इस मण्डी में ख़बरों के मुताबिक अच्छी कीमत लग रही है. सीपीआई के महासचिव एबी बर्धन ने 25 करोड़ रूपये की बात कही तो इसके जवाब में समाजवादी पार्टी के अमर सिंह ने अपने एक सांसद को मायावती की तरफ़ से 30 करोड़ के ऑफर की बात कहकर दाम और बढ़ा दिया. और लगता है की छोटी पार्टियों के अलावा शायद असल खेल भी उत्तर प्रदेश में है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के राजनीतिक संपादक दिवाकर कहते हैं, "कांग्रेस की सारी उम्मीद 39 सांसदों वाली समाजवादी पार्टी पर टिकी है और बीएसपी उनको तोड़ने में लगी है. बीएसपी के इस दावे को आसानी से नज़रंदाज़ नही किया जा सकता है. जिन लोगों को भी डर है की सपा से उनको टिकट नहीं मिलेगा, वो बीएसपी के साथ जा सकते हैं." उनका मानना है, "अभी ऐसे समझौते किए जा सकते हैं कि आप सरकार गिरा दें तो आपको टिकट दिया जाएगा. दूसरे, आम तौर पर हिन्दी बेल्ट में पुलिस और पॉलिटिक्स दोनों साथ-साथ चलते हैं. सपा के बहुत सारे लोगों पर मुक़दमे हैं तो जो भी सरकार से कुछ राहत चाहता है वो वो बीएसपी के साथ जा सकते हैं. लेकिन इसके ठीक विपरीत मायावती एक ऐसी नेता हैं जिनसे उनके सहयोगी जल्दी ही ऊब जाते हैं ऐसे नेताओं को सपा भी चाहे तो लुभा सकती है.'' सीपीएम नेता एमके पंधे ने परमाणु समझौते को मुसलमानों से जोड़कर एक बयान क्या दे दिया सभी इसके पीछे ही लग गए हैं. तो क्या वाकई इस मुद्दे पर मुसलमानों की राय को आम भारतीय से अलग करके देखा जा सकता है? जमीतुल उलेमा-ए- हिंद के प्रवक्ता अब्दुल हमीद नोमानी इसे बहुत दुखदायी बताते हैं, "ये मुझे बहुत बुरा लगता है. एक राष्ट्रीय मुद्दे को मुसलमानों से जोड़कर देखना सांप्रदायिक रंग देना है लेकिन साथ ही ये कहना कि मुसलमानों का इससे कोई लेना देना नहीं है यह मुसलमानों की मौजूदगी को नकारना है. मेरे हिसाब से दोनों बातें ग़लत है. बिजली की ज़रूरत कों पूरा करना भी लाज़मी है और भारत की विदेश नीति भी किसी दबाव में न आए ये देखना भी ज़रूरी है.'' अब्दुल हमीद नौमानी कहते हैं की इस मुद्दे को मुसलमानों से जोड़ने से मुसलमानों का ही घाटा है क्योंकि इसकी ज़िम्मेदारी मुसलमानों पर डाल दी जायेगी. अगर समझौता नहीं होता है तो लोग कहेंगे की मुसलमानों ने देश की तरक्की में रुकावट डालते हुए डील नहीं होने दिया और अगर समझौता हो जाता है तो मुसलमानों की राजनितिक शक्ति को ठेस लगेगी. ये तो बिलकुल साफ़ है कि समझौते को किसी ख़ास जाति या धर्म से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए लेकिन समझौते के बहाने सरकार अगर अमरीका और इसराइल के बहुत क़रीब दिखाई पड़ती है तो मुसलमानों को नाराज़गी भी हो सकती है. शायद यही वजह है कि सभी फूँक-फूँक कर क़दम रख रहे हैं. दिवाकर के मुताबिक, "ये एक नई तरह की परिस्थिति पैदा हो रही है कि पहली बार तथाकथित सेकुलर पार्टियों को इस कसौटी पर परखने की कोशिश की जा रही है कि आपका यह क़दम मुसलमानों के समर्थन में है या उनके विरोध में है. सामाजवादी पार्टी को भी कहीं न कहीं डर है कि उसका यूपीए और इस तरह से अमरीका के साथ जाने का फ़ैसला कहीं उनके ख़िलाफ़ तो नहीं चला जाएगा. इसीलिए पूर्व राष्ट्रपति कलाम का नाम बार-बार लिया जाता है." और तो और विदेश राज्य मंत्री ई अहमद ने भी कहा कि उनकी पार्टी यानी आईयूएमएल समझौते के ख़िलाफ़ है लेकिन वो सरकार के साथ हैं. ज़ाहिर है वो मंत्री भी रहे और सरकार का सदन में विरोध भी करें, दोनों तो संभव नहीं है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि संवाददाता सम्मेलन में कोई पार्टी चाहे जो कहे अब तक के रुझान यही बताते हैं कि खेल अभी भी खुला है. और वैसे भी ट्वेंटी-20 के इस दौर में अगले ओवर में क्या होगा किसे पता. अगली गेंद पर छक्का या चौका लगेगा या उसी गेंद पर विकेट गिर जाएगी. | इससे जुड़ी ख़बरें संसद में उठा सीपीएम-आरएसएस मामला10 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस संसद में सरकार को घेरने की तैयारी14 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस महंगाई के मुद्दे पर संसद में हंगामा15 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस महंगाई पर सरकार को घेरने की तैयारी16 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस महँगाई के मुद्दे पर संसद में हंगामा24 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस झुक गए सोमनाथ, फ़ैसला वापस लेंगे05 मई, 2008 | भारत और पड़ोस महिला आरक्षण पर संसदीय बैठक27 मई, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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