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लोकसभा में विश्वास मत पर तीखी बहस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में परमाणु मुद्दे पर वाम मोर्चे की समर्थन वापसी के बाद लोकसभा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विश्वास प्रस्ताव लाए हैं और सोमवार को उस पर ज़ोर-शोर से बहस हुई. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संक्षिप्त भाषण में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की चार साल काम पर वोट माँगा और बहस की शुरुआत की. जहाँ विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार पर तीखे प्रहार किए वहीं विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सरकार का बचाव करते हुए भाजपा और वामपंथी पार्टियों के आरोपों को ख़ारिज कर दिया. वाम मोर्च की ओर इशारा करते हुए विदेश मंत्री मुखर्जी ने कहा, "यूपीए और वाम मोर्चे की समन्वय समिति की बैठक में तय हुआ था कि समय-समय पर भारत और आईएईए के बीच जो पत्राचार होता है वह वाम मोर्चे के प्रतिनिधियों को उपलब्ध नहीं होगा लेकिन जब निर्णायक दौर में अंतिम मसौदा बनता है तो उसके बारे में वामपंथी प्रतिनिधियों को भी बताया जाएगा. इसलिए वाम मोर्चे के साथ किसी तरह का विश्वासघात नहीं हुआ." मुखर्जी ने कहा, "देश में कभी अंतरराष्ट्रीय समझौते संसद के अनुमोदन के लिए पेश नहीं किए गए. यहाँ तक कि भारत-सोवियत रूस शांति समझौते के बारे में भी संसद को बाद में ही पता चला था. लेकिन संसद में परमाणु मुद्दे पर दो बार तो बहस हो चुकी है और अब फिर हो रही है." विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी की ओर इशारा करते हुए प्रणव मुखर्जी ने कहा, "यदि भाजपा चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय संधियों पर संसद की मुहर लगे तो फिर जब संविधान में सशोधन करने के लिए एनडीए के कार्यकाल में समिति बनाई गई थी तब ऐसा संशोधन क्यों नहीं लाया गया. जब भारत-सोवियत संघ के बीच 1970 में संधि हुई थी तब भी संधि होने के बाद ही संसद को बताया गया था." राष्ट्रीय ऊर्जा की स्थिति पर चर्चा करते हुए प्रणव मुखर्जी ने कहा कि अमरीका और रूस जैसी स्थिति भारत की नहीं है क्योंकि वो देश तो जैसे तेल पर तैर रहे हैं यानी उनके पास अच्छे खासे तेल के भंडार हैं, जो भारत के पास नहीं हैं. उनका कहना था कि इसीलिए भारत के लिए ये समझौता अहम है. 'सरकार आईसीयू में भर्ती है' उनके तत्काल बाद बोलते हुए विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि यूपीए सरकार ख़ुद इस विश्वास प्रस्ताव की बहस के लिए ज़िम्मेदार है जबकि अर्थव्यवस्था, महँगाई और कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान देने की ज़रूरत हैं. आडवाणी का कहना था, "चुनाव से कुछ महीने पहले यदि ये बहस हो रही है तो इसकी ज़िम्मेदार सरकार ख़ुद है और प्रधानमंत्री जी विशेष तौर पर है. एक साल पहले जब उन्होंने एक अख़बार को इंटरव्यू में कहा कि यदि वाम मोर्चा परमाणु समझौते से सहमत नहीं तो वह जो फ़ैसला करने चाहे कर सकता है. तब से लेकर पिछले एक साल तक सरकार को जैसे लकवा ही मारा रहा है." आडवाणी का कहना था, "संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार अस्पताल के आईसीयू में भर्ती मरीज़ की तरह है और स्वाभाविक है कि ये सवाल पूछा जाए कि क्या ये मरीज़ बचेगा या नहीं?" उधर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मोहम्मद सलीम ने बहस में हिस्सा लेते हुए यूपीए को निशाना बनाया और कहा कि सवाल विश्वसनीयता का है. उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री यह कह कर विश्वास प्रस्ताव लाए कि सदन को मंत्रिपरिषद में विश्वास है लेकिन सवाल यहां विश्वसनीयता का ही है. विश्वास तोड़ा गया है."
उन्होंने न्यूनतम साझा कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि वाम दलों ने यूपीए के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर समझौता किया था लेकिन कांग्रेस सरकार ने अमरीका के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना लिया. सलीम का कहना था कि यह सभी जानते हैं कि कई नीतियों पर कांग्रेस और वाम दलों के मतभेद हैं मसलन विनिवेश, आर्थिक नीति लेकिन विदेश नीति के मसले पर कांग्रेस अपनी ही नेताओं के सुझाए हुए रास्ते का विरोध करेगी. 'इस स्थिति से बच सकते थे' सत्र की शुरुआत में भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद यूपीए सरकार के विश्वास प्रस्ताव को पेश करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा - 'मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि सदन मंत्रिपरिषद में अपना विश्वास व्यक्त करता है.' इस विश्वास प्रस्ताव पर बहस के लिए 12 घंटे का समय दिया गया है लेकिन ज़रुरत पड़ने पर यह समय बढ़ सकती है. प्रधानमंत्री ने क़रीब सात मिनट के भाषण में कहा कि पूर्व में भी कई सरकारों को विश्वास मत हासिल करना पड़ा है और पहले तो कई सरकारों को सत्ता में आने के दो तीन महीने में ही ऐसा करना पडा लेकिन यूपीए सरकार के लिए चार साल के बाद यह मौक़ा आया है. उल्लेखनीय है कि वाम दलों के अमरीका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें समर्थन वापसी की जानकारी तब मिली जब वो जी-9 की बैठक में थे. उन्होंने कहा, "इस स्थिति से बचा जा सकता था. हम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से बात कर रहे थे. अगर ये बातचीत आगे बढ़ने दी जाती तो मैं खुद ही संसद के पास आता और परमाणु समझौते को आगे बढ़ाने के बारे में सांसदों से दिशा निर्देश लेता कि इसमें आगे कैसे बढ़ा जाए." प्रधानमंत्री का कहना था कि वाम दलों ने ऐसे समय में समर्थन वापस लिया जब देश मंहगाई जैसे मुद्दे से जूझ रहा था और सरकार आम लोगों को राहत दिलाने की कोशिश में लगी थी. उनका कहना था, हमने हर नीति बनाने से पहले लोगों के हितों को ध्यान में रखा है और इन नीतियों के ज़रिए हमने देश को 21वीं सदी के लिए तैयार करने की कोशिश की है. मनमोहन सिंह ने यूपीए गठबंधन बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले नेताओं विशेष तौर पर करुणानिधि, ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत का शुक्रिया अदा किया. प्रधानमंत्री ने गुरु गोविंद सिंह के दोहे - 'देहि शिवा वर मोहे इहें, शुभ करमन तें कबहुँ न टरों...' के साथ भाषण समाप्त किया. बहस के बाद मंगलवार को विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होगा जिसमें पता चल सकेगा कि पिछले 15 दिनों तक विभिन्न पार्टियों की जोड़ तोड़ क्या रंग लाती है. |
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