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'सरकार जनता को गुमराह न करे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की लोकसभा में विश्वास मत पर बहस के दौरान विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सत्तापक्ष पर तीखे प्रहार किए और विश्वास मत के लिए यूपीए सरकार और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ख़ुद ज़िम्मेदार ठहराया. आडवाणी का कहना था, "संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार अस्पताल के आईसीयू में भर्ती मरीज़ की तरह है तो स्वाभाविक है सवाल पूछा जाए कि क्या ये बचेगा या नहीं? ये स्थिति विपक्ष ने, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) या वाम मोर्चे ने नहीं पैदा की बल्कि इस स्थिति और विश्वास मत की ज़िम्मेदार सरकार ख़ुद है, विशेष तौर पर प्रधानमंत्री जी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं." उनका कहना था कि एक साल पहले प्रधानमंत्री ने टेलीग्राफ़ अख़बार को इंटरव्यू दिया था और कहा था कि यदि वाम मोर्चा भारत-अमरीका परमाणु समझौते से संतुष्ट नहीं तो वे कुछ भी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं. गठबंधन धर्म नहीं निभाया आडवाणा ने आरोप लगाया, "पिछले एक साल से जैसे सरकार को लकवा मार गया है. एनडीए ने छह साल तक गठबंधन सरकार चलाई थी लेकिन यूपीए ने गठबंधन सरकार का धर्म नहीं निभाया. यदि परमाणु क़रार का मुद्दा इतना महत्वपूर्ण था तो इसे यूपीए-वाम ने अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम में क्यों शामिल नहीं किया? कभी-कभी लगता है कि ये दो देशों के बीच क़रार नहीं बल्कि दो लोगों के बीच में समझौता है. प्रधानमंत्री जी मुझे ये कहते ख़ुशी नहीं होती कि भारत का सिर झुके और हम किसी ताक़त के जूनियर पार्टनर बनें." उनका कहना था कि भारत-अमरीका परमाणु समझौते में भारत को ग़ैर-परमाणु हथियार ताक़त बताया गया है. उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के सदस्य और विदेशी प्रतिनिधि मसौदे को देख सकते हैं लेकिन भारतीय संसद नहीं. 'संविधान में संशोधन हो' विपक्ष के नेता का कहना था, "हम सदन के पटल पर सरकार को हराना चाहते हैं, लेकिन हम चुनी हुई सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहते जैसे कि कांग्रेस ने देवेगौड़ा, गुजराल और वाजपेयी सरकारों को किया था." आडवाणी ने कहा, "प्रधानमंत्री को गुप्त ढंग से परमाणु मामले पर आईएईए में नहीं जाना चाहिए था. हमें बताया जा रहा है कि अब संसद की कोई भूमिका नहीं है अब तो परमाणु समझौता ऑटो-पायलट पर है यानी ख़ुद-बख़ुद पूरा हो जाएगा." लालकृष्ण आडवाणी का कहना था कि भाजपा परमाणु ऊर्जा के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि अमरीका के साथ क़रीबी रिश्ते, रणनीतिक रिश्ते चाहता है. लेकिन उनका ये भी कहना था, " हम किसी भी एकतरफ़ा समझौते का समर्थन नहीं कर सकते. ये समझौता हमें दूसरी ताकत का ग़ुलाम बनाता है. हाईड एक्ट परमाणु संप्रभुता पर ही नहीं बल्कि विदेश नीति पर भी लगाम लगाता है." लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, "मैं चाहता हूँ कि संविधान में संशोधन हो ताकि सुरक्षा, संप्रभुता के मुद्दों पर संसद की पुष्टि अनिवार्य हो. क्या पता कल अरुणाचल या किसी और मुद्दे पर समझौता हो या फिर कोई ऐसा समझौता हो कि पोख़रण-3 या पोख़रण-4 नहीं होगा? यदि एनडीए सत्ता में आती है तो इस समझौते पर दोबारा अमरीका के साथ चर्चा होगी और पुनर्विचार होगा." प्रधानमंत्री जी क्या सर्वसम्मति है? प्रधानमंत्री को बार-बार निशाना बनाते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, "प्रधानमंत्री ने 20 जुलाई 1995 को वॉशिंगटन में कहा था कि संसद संप्रभु है और हम सर्वसम्मति के आधार पर ही आगे बढ़ सकते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री जी क्या संसद में इस मुद्दे पर सर्वसम्मति है? जब वाम ने समर्थन वापस लिया तो सरकार अल्पमत में आ गई और ऐसी सरकार को अंतरराष्ट्रीय समझौते पर आगे बढ़ने का अधिकार नहीं है." उनका कहना था कि सभी पर्यवेक्षकों ने माना है कि अमरीका को इस समझौते से ये फ़ायदा होगा कि भारत परमाणु अप्रसार संधि के अंतरगत आ जाएगा. इस बीच प्रधानमंत्री पर उठाए सवाल का जवाब देते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, "राज्यसभा में पोखरण टेस्ट की बात करने का मतलब ये नहीं कि मैं टेस्ट के ख़िलाफ़ था. मेरे भाषण को पढ़ें और फिर दोबारा उसका आकलन करें. उस समय प्रतिबंधों की बात हुई थी और कहा गया था कि उनकी चिंता करें या नहीं और मैने कहा कि हमें चिंता है लेकिन हमें इनके लिए तैयार भी रहना चाहिए. " विपक्ष के नेता ने ये सवाल भी उठाया कि देश को बताया जाए कि परमाणु ऊर्जा किस क़ीमत पर, कब और कितनी मिलेगी. उनका कहना था कि अनुमान ये हैं कि इसके बाद भी परमाणु ऊर्जा केवल छह प्रतिशत ही मिलेगी और जनता को इस मुद्दे पर गुमराह नहीं किया जाना चाहिए. |
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