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बुधवार, 26 मार्च, 2008 को 08:10 GMT तक के समाचार
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'आम सहमति के बाद होगा समझौता'
वामपंथी नेताओं के साथ प्रणव मुखर्जी
वामपंथी इस क़रार को रणनीतिक रूप से भारत के अमरीकी पाले में जाने की तरह देखते हैं
अमरीका दौरे पर गए भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि जब तक राजनीतिक आम सहमति नहीं बन जाती, भारत अमरीका के साथ परमाणु समझौते पर आगे नहीं बढ़ेगा.

उन्होंने कहा कि हम इस ऐसा रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं जो सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों को भी पसंद आए.

वामपंथी दल अमरीका से परमाणु समझौते का विरोध कर रहे हैं. वे इस समझौते को रणनीतिक रूप से भारत के अमरीकी पाले में जाने की तरह देखते हैं.

कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने वामपंथियों की आपत्तियों को सुलझाने के लिए एक समन्वय समिति भी बनाई है.

इस समिति की हाल ही में संपन्न बैठक के बाद वामपंथी दलों ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया था कि सरकार समझौते के लिए कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखा रही है.

प्रणव मुखर्जी का यह बयान उस समय आया है जब इस तरह की ख़बरें आ रही हैं कि बुश प्रशासन ने भारत पर मई के अंत तक अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) से समझौता करने और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) से छूट हासिल करने के लिए दबाव बढ़ा दिया है.

भारतीय विदेश मंत्री ने कहा, "अगर हम आम सहमति तैयार कर पाने में कामयाब रहते हैं तभी प्रक्रिया(परमाणु समझौते) को तेज़ी से बढ़ा पाना संभव होगा."

सरकार की चिंता

अमरीका की दो दिनों की सरकारी यात्रा पर गए मुखर्जी ने वहाँ अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश और अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस से मुलाक़ात की थी.

जार्ज बुश के साथ प्रणव मुखर्जी
प्रणव मुखर्जी को आशंका है कि क़रार को नहीं माना तो स्थिति अपमानजनक होगी

पत्रकारों से बातचीत में प्रणव मुखर्जी ने कहा कि यूपीए सरकार भारत-अमरीका असैनिक परमाणु समझौते के लिए इच्छुक है और वह समय सीमा से भी अवगत है लेकिन कई मामलों को सुलझाना अभी बाक़ी है.

प्रणव मुखर्जी से मुलाक़ात के दौरान राइस ने कहा था कि दोनों पक्षों के लिए ऐतिहासिक इस समझौते पर हमलोग काम जारी रखेंगे.

भारत में इस समझौते की प्रक्रिया में तेज़ी के सवाल पर मुखर्जी ने कहा, " देखते हैं, घटनाक्रमों की अपनी गति है."

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने आईएईए से भारत केंद्रित समझौते का मसौदा तैयार तो कर लिया है लेकिन इस समय यह बता पाना मुश्किल है कि समझौता कब तक हो जाएगा.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सरकार के सामने समझौते या सरकार की बलि देने का सवाल नहीं है.

निकोलस बर्न्सपरमाणु ईंधन चाहिए तो
अमरीका ने कहा कि समझौता नहीं तो परमाणु ईंधन, तकनीक भी नहीं.
परमाणु संयंत्रसांसदों को खुला पत्र
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भारत पर दबाव नहीं
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