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सोमवार, 21 जुलाई, 2008 को 14:58 GMT तक के समाचार
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धोखा देने का सवाल ही नहीं: मुखर्जी
वामपंथी नेताओं के साथ प्रणव मुखर्जी
किसी तरह का धोखा देने का सवाल पैदा नहीं होता: मुखर्जी
भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने विश्वास मत पर हो रही बहस के दौरान भारतीय जनता पार्टी नेता लालकृष्ण आडवाणी के सरकार पर किए गए तीख़े प्रहार का जवाब दिया है और वाम दलों को भी निशाना बनाया है.

आडवाणी की हाईड एक्ट पर आपत्ति के बारे में प्रणव मुखर्जी ने कहा कि ये केंद्र सरकार को भी स्वीकार्य नहीं है और इसके बारे में सरकार ने भी अमरीका के सामने आपत्ति उठाई थी और इसीलिए उसका 123 समझौते में कोई ज़िक्र नहीं है.

'कोई विश्वासघात नहीं हुआ'

विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वाम मोर्च की ओर इशारा का कहना था, "यूपीए और वाम मोर्चे की समन्वय समिति की बैठक में तय हुआ था कि समय-समय पर भारत और आईएईए के बीच जो पत्राचार होता है वह वाम मोर्चे के प्रतिनिधियों को उपलब्ध नहीं होगा लेकिन जब निर्णायक दौर में अंतिम मसौदा बनता है तो उसके बारे में वामपंथी प्रतिनिधियों को भी बताया जाएगा."

 यूपीए और वाम मोर्चे की समन्वय समिति की बैठक में तय हुआ था कि समय-समय पर भारत और आईएईए के बीच जो पत्राचार होता है वह वाम मोर्चे के प्रतिनिधियों को उपलब्ध नहीं होगा लेकिन जब निर्णायक दौर में अंतिम मसौदा बनता है तो उसके बारे में वामपंथी प्रतिनिधियों को भी बताया जाएगा.इसलिए किसी तरह का धोखा देने का सवाल पैदा नहीं होता
प्रणव मुखर्जी

उनका कहना था, "जब भारत-आईएईए समझौते का मसौदा आईएईए के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स को भेजा गया तो वह सार्वजनिक भी कर दिया गया. इसलिए किसी तरह का धोखा देने का सवाल पैदा नहीं होता."

जहाँ तक आडवाणी के सरकारों को अस्थिर न करने का दावा था, उस पर मुखर्जी ने कहा कि 1977 में जब जनसंघ के सदस्य जनता पार्टी सरकार का हिस्सा थे और सभी जनता पार्टी से बाहर आए थे तो क्या वह सरकार को अस्थिर करने का काम नहीं था.

विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी की ओर इशारा करते हुए प्रणव मुखर्जी ने कहा, "यदि भाजपा चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय संधियों पर संसद की मुहर लगे तो फिर जब संविधान में सशोधन करने के लिए एनडीए के कार्यकाल में समिति बनाई गई थी तब ऐसा संशोधन क्यों नहीं लाया गया. जब भारत-सोवियत संघ के बीच 1970 में संधि हुई थी तब भी संधि होने के बाद ही संसद को बताया गया था."

'अपने कार्यकाल में संविधान संशोधन क्यों नहीं किया?'

 यदि भाजपा चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय संधियों पर संसद की मुहर लगे तो फिर जब संविधान में सशोधन करने के लिए एनडीए के कार्यकाल में समिति बनाई गई थी तब ऐसा संशोधन क्यों नहीं लाया गया. जब भारत-सोवियत संघ के बीच 1970 में संधि हुई थी तब भी संधि होने के बाद ही संसद को बताया गया था
प्रणव मुखर्जी

ऊर्जा के मुद्दे पर प्रणव मुखर्जी का कहना था कि अमरीका और रूस के साथ भारत का मुकाबला नहीं किया जा सकता क्योंकि वे तो मानो तेल पर तैर रहे हैं. उनका कहना था कि इन देशों के तेल के भंडार और पारंपरिक ईंधन के भंडार भारत से कहीं ज़्यादा हैं इसीलिए भारत को परमाणु ऊर्जा की ज़रूरत है.

वाम को निशाना बनाते हुए विदेश मंत्री का कहना था, "वाम के नेता अपना दिल टटोलें और ईमानदारी से बताएँ कि क्या वे इसी मुद्दे पर सरकार गिराना चाहते है जब भारत की अर्थव्यवस्था हर साल नौ प्रतिशत की दर से विकास कर रही है? हमारे वाम के दोस्त वर्ष 1988 की ग़लती न दोहराएँ जब कोलकाता में उन्होंने कहा था कि भाजपा अछूत नहीं है. भाजपा जो बाबरी
मस्जिद विध्वंस के लिए ज़िम्मेदार है...जो लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए ज़िम्मेदार है..."

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