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सोमवार, 21 जुलाई, 2008 को 14:48 GMT तक के समाचार
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भारतीय संसद और सत्ता का सफ़रनामा
जवाहरलाल नेहरू
भारतीय संसद 21-22 जुलाई, 2008 को अपने इतिहास का 12वाँ विश्वास मत प्रस्ताव देख रही है. विश्वास मत का सामना करने वाले मनमोहन सिंह देश के छठे प्रधानमंत्री हैं.

मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार को भारत अमरीका परमाणु समझौते पर पैदा हुए राजनीतिक गतिरोध के बाद यह विश्वास मत हासिल करना पड़ रहा है.

इस ताज़ा विश्वास प्रस्ताव से पहले के विश्वास प्रस्तावों और अविश्वास प्रस्तावों को याद किया जाए तो पाएंगे कि इन प्रस्तावों के दौरान भारतीय राजनीति का स्वरूप कई बड़े राजनीतिक परिवर्तनों की वजह भी बना है.

यहाँ आपकी सुविधा के लिए बता दें कि विश्वास प्रस्ताव सरकार की ओर से अपना बहुमत और मंत्रिमंडल में सदन का विश्वास स्थापित करने के लिए लाया जाता है जबकि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष की ओर से सरकार के ख़िलाफ़ लाया जाता है.

अविश्वास प्रस्ताव संसद में वर्ष 1963 से आते रहे. पहला अविश्वास प्रस्ताव आया था पंडित नेहरू के ख़िलाफ़. जेबी कृपलानी ने संसद में प्रधानमंत्री नेहरू के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव रखा था पर इसे करारी हार मिली.

लोकसभा कुल 26 अविश्वास प्रस्तावों का सामना कर चुकी है. सबसे ज़्यादा अविश्वास प्रस्ताव झेले इंदिरा गांधी ने. 15 अविश्वास प्रस्ताव (12 प्रस्ताव वर्ष 1966 से 1975 और तीन प्रस्ताव वर्ष 1981-82 के दौरान) में से एक भी इंदिरा गांधी को नुकसान नहीं पहुँचा सका.

संसद में सत्ता के गलियारों के बीच पिछले छह दशकों के साँप सीढ़ी के खेल को जानने के लिए एक बार भारत में केंद्रीय सरकारों के इतिहास को देखना होगा. यह भी कि कब कौन सत्ता के दाँव में जीतकर देश की बागडोर संभालता रहा.

सत्ता का सफ़र

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने पंडित जवाहर लाल नेहरु. पंडित नेहरू 15 अगस्त, 1947 से 27 मई 1964 तक काँग्रेस के नेता के तौर पर सत्तासीन रहे.

इंदिरा गांधी
इंदिरा गांधी तीन बार भारत की प्रधानमंत्री बनीं

इसके बाद आए गुलजारी लाल नंदा. गुलजारी लाल नंदा 27 मई, 1964 से नौ जून, 1964 तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहे और फिर उनकी जगह ले ली लाल बहादुर शास्त्री ने.

लाल बहादुर शास्त्री नौ जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे. इसके बाद फिर गुलजारी लाल नंदा ने 24 जनवरी, 1966 तक पद का दायित्व संभाला.

इसके बाद वक्त आता है इंदिरा गांधी का. 24 जनवरी, 1966 से 1971 तक और फिर दोबारा चुनकर 24 मार्च, 1977 तक काँग्रेस के झंडे के साथ इंदिरा गांधी सत्तासीन रहीं.

अभी तक भारत में एक ही पार्टी की सरकार क़ायम थी. पर राजनीतिक नेतृत्व में दलीय परिवर्तन आता है मोरार जी देसाई के प्रधानमंत्री बनने के साथ.

अविश्वास की चोट

वीपी सिंह
वीपी सिंह एक बड़े राजनीतिक बदलाव के साथ आए पर टिक न सके

जनता पार्टी की सरकार में मोरार जी देसाई ने 24 मार्च, 1977 से 28 जुलाई, 1979 तक प्रधानमंत्री का पद संभाला. उन्हें 15 जुलाई, 1979 को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा जिसके बाद सरकार गिर गई.

इसके बाद चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई, 1979 को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आए लेकिन 20 अगस्त, 1979 को विश्वास मत का सामना किए बिना ही चरण सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

पहले दो बार प्रधानमंत्री रह चुकी इंदिरा गांधी 14 जनवरी, 1980 को कांग्रेस (आई) की नेता के तौर पर फिर से सत्तासीन होती हैं और फिर 31 अक्टूबर, 1984 तक प्रधानमंत्री बनी रहती हैं.

इंदिरा गांधी के देहांत के बाद उनके बेटे राजीव गांधी युवा नेतृत्वकर्ता के तौर पर राजनीतिक पटल पर सामने आते हैं. राजीव गांधी 31 अक्टूबर, 1984 से दो दिसंबर, 1989 तक प्रधानमंत्री पद संभालते हैं.

इसके बाद जनता दल का राजनीतिक बिगुल बजा, सत्ता के समीकरण बदले और विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी.

दो दिसंबर, 1989 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ दिन बाद ही यानी 21 दिसंबर को देश की संसद में पहला विश्वास मत प्रस्ताव आया और विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने ध्वनि मत से विश्वास मत हासिल किया.

नई परंपरा की शुरुआत

अटल बिहारी वाजपेयी
अटल 13 दिन, फिर 13 महीने और फिर पाँच साल के लिए प्रधानमंत्री रहे

विश्वनाथ प्रताप सिंह 10 नवंबर, 1990 तक प्रधानमंत्री रहे. सात नवंबर को ही प्रधानमंत्री को दोबारा विश्वास मत हासिल करने के लिए प्रस्ताव सदन के समक्ष रखना पड़ा पर वीपी सिंह अपनी कुर्सी नहीं बचा सके.

10 नवंबर, 1990 को चंद्रशेखर ने जनता दल (एस) के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री का पद संभाला और छह दिन बाद ही यानी 16 नवंबर को सदन में दूसरा विश्वास मत प्रस्ताव आया. चंद्रशेखर ने विश्वास मत हासिल किया और 21 जून, 1991 तक देश के प्रधानमंत्री रहे.

दो बरस के ग़ैर कांग्रेस राज के बाद देश की बागडोर एक बार फिर से कांग्रेस के हाथ में आ गई. पीवी नरसिंहराव ने 21 जून, 1991 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

इसी के लगभग चार हफ़्ते बाद 15 जुलाई को दो दिन की बहस के बाद नरसिंहराव का सरकार ने सदन में विश्वास मत हासिल कर लिया. ये सरकार पूरे पाँच साल चली. हालांकि इस दौरान सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव भी आया पर सरकार गिरी नहीं.

विवादित झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड नरसिंहराव के इसी कार्यकाल में बहुमत की गणित के लिए चर्चा और चिंता का विषय बना.

इसके बाद सत्ता ने नई करवट ली और भारतीय जनता पार्टी की अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी. अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

ये सरकार 13 दिनों में गिर गई. 28 मई, 1996 को विश्वास मत से पहले ही अटल बिहारी वाजपेयी ने इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी.

इसके बाद एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में सरकार बनी. 12 जून, 1996 को सातवाँ विश्वास मत देवेगौड़ा ने हासिल किया. हालांकि देवेगौड़ा अगला विश्वास मत हासिल नहीं कर सके. 11 अप्रैल, 1997 को देवेगौड़ा विश्वास मत हार गए.

देवेगौड़ा के बाद इंद्र कुमार गुजराल ने कुर्सी संभाली, 22 अप्रैल, 1997 को विश्वास मत हासिल किया और 19 मार्च, 1998 तक जनता दल की सरकार को आगे बढ़ाया.

अटल का दौर

मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश
अमरीका के साथ परमाणु क़रार पर मनमोहन सिंह की सरकार पर संकट पैदा हुआ

मार्च, 1998 में देश की 12वीं लोकसभा के लिए मतदान हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी 19 मार्च, 1998 को देश के नए प्रधानमंत्री बने. उन्होंने 28 मार्च को सदन में विश्वास मत भी हासिल किया.

इसके बाद 13 महीने की सरकार 1999 में फिर गिर गई. वर्ष 1999 का यह विश्वास मत ऐतिहासिक माना जाता है. जयललिता की नेतृत्व वापसी की घोषणा के बाद अल्पमत में आई अटल सरकार एक वोट से गिर गई.

1999 में आखिरी महीनों में फिर से आम चुनाव हुए और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार आई. इसने अपने कार्यकाल के पाँच साल पूरे भी किए.

पर वर्ष 2004 में जब आम चुनाव हुए जो जनादेश एनडीए के ख़िलाफ़ गया. केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए गठबंधन सत्तासीन हुआ.

इस सरकार को वामपंथी दलों से भी बाहर से समर्थन मिल रहा था पर भारत-अमरीका परमाणु क़रार पर पैदा हुए गतिरोध के कारण जुलाई, 2008 में वामपंथी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

21-22 जुलाई की तारीखें इस सरकार के लिए निर्णायक साबित हो सकती हैं.

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