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उत्तर प्रदेश: बनते-बिगड़ते समीकरण

मायावती और मुलायम सिंह यादव
मायावती विश्वास मत को लेकर हुई राजनीति के बाद तीसरे मोर्चे की नेता बनकर उभरी हैं.
लोकसभा में शक्ति परीक्षण के दौरान कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की जीत उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के लिए एक बड़ा तात्कालिक झटका माना जा रहा है.

पिछले कुछ दिनों मे यहाँ की राजनीति ने एकदम अप्रत्याशित मोड़ ले लिया. इनमे सबसे अप्रत्याशित था बहुजन समाज पार्टी और भारतीय लोकदल का एक साथ आना और मुख्यमंत्री मायावती का इलाहाबाद से समाजवादी पार्टी के बागी सांसद अतीक अहमद को अपने साथ मिला लेना.

समाजवादी पार्टी के छह सांसद तोड़ लेने के बावजूद सुश्री मायावती मनमोहन सरकार को गिराने और अपने को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पाईं.

मायावती-मुलायम

मुख्यमंत्री मायावती ने पिछले महीने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेते हुए जो कारण गिनाए थे, उनमें मनमोहन सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश के साथ कथित सौतेला व्यवहार, महँगाई के अलावा आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई केस का ख़ात्मा प्रमुख मुद्दे थे.

उस समय उन्होंने अमरीका से परमाणु डील का मामला नहीं उठाया.

कांग्रेस से मायावती का साथ छूटते ही मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, अमेरिका से परमाणु डील पर अपना विरोध भुलाकर, मनमोहन सरकार के लिए संकट मोचक की मुद्रा में आ गई.

उधर भाजपा के प्रधामंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी कानपुर रैली मे माया सरकार के प्रति हमदर्दी जताकर नई अटकलों को जन्म दे दिया.

इसके बाद मायावती ने अपनी सफ़ाई में और मुस्लिम मतों को लुभाने के लिए परमाणु डील के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया.

इसी बीच सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफ़नामा दायर करके कहा कि सुश्री मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में उसके पास पार्याप्त सबूत हैं और चार्जशीट तैयार है. 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई होनी है. अगर सीबीआई इस मामले में चार्जशीट दाख़िल करती है तो मायावती के प्रधानमंत्री बनने की राह में यह एक बड़ा रोड़ा हो सकती है.

प्रेक्षकों का कहना है कि इसीलिए मनमोहन सरकार को गिराना इस समय मायावती की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मायावती ने हर उस पार्टी और नेता से हाथ मिलाया, जो मनमोहन सरकार को गिराने में मदद कर सकता था.

 मनमोहन सरकार को गिराना इस समय मायावती की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मायावती ने हर उस पार्टी और नेता से हाथ मिलाया, जो मनमोहन सरकार को गिराने में मदद कर सकता था
राजनीतिक प्रेक्षक

मुलायम सिंह के हटने से आई कमजोरी दूर करने के लिए यूएनपीए ने मायावती को हाथो-हाथ लिया और उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया. सीपीआई के महासचिव एबी बर्धन ने भी मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही.

लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मायावती की दावेदारी सीधे तौर पर आडवाणी जी का रास्ता बंद करने जैसा होती.

इसलिए भाजपा ने साफ़ कर दिया था कि अगर सरकार गिरती है तो भी वह वैकल्पिक सरकार बनाने के पक्ष में नहीं है. भाजपा के पीछे हटते ही मायावती का दावा कमज़ोर हो गया.

चिंता का विषय

संसद में बहस के दौरान बसपा सांसदों ने जिस तरह सीबीआई पर निशाना साधा, उससे भी साफ़ है कि आय से अधिक सम्पत्ति का मामला मायावती के लिए इस समय चिंता का कितना बड़ा कारण हो गया है.

संसद में जीत से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल तो बढ़ा ही है, उससे ज़्यादा ख़ुशी समाजवादी पार्टी खेमे में थी.

सवा साल पहले विधानसभा चुनाव में हार के बाद से समाजवादी पार्टी और उसके नेता बेहद परेशान थे.

सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने तो मौज़ूदा हालत को 1975 के आपातकाल से भी ज़्यादा भयावह बताया.

माना जाता है कि मायावती सरकार के खौफ़ से ही मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस का साथ पकड़ा और वामपंथी दलों के झटके से परेशान कांग्रेस के लिए मुलायम संकट मोचक साबित हुए.

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है कि इस जीत से मायावती सरकार पर अंकुश लगेगा और बसपा का विरोध बढ़ेगा.

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों के कार्यकर्ता मानसिक रूप से अगला लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने को तैयार हैं. हालांकि दोनों पार्टियों के हाई कमान को औपचारिक फ़ैसला लेना अभी बाकी है.

मुलायम सिंह यादव पहली बार कांग्रेस के साथ तालमेल से लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार हैं. पर इस गठजोड़ के प्रति मुस्लिम समुदाय का क्या रुख़ रहता है यह भी देखने वाली बात होगी.

प्रेक्षकों का कहना हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले अमरीका में नया राष्ट्रपति आ जाएगा और यहाँ भाजपा नेता आडवाणी प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे. ऎसी स्थिति में दिल्ली की गद्दी पर आडवाणी को रोकना अल्पसंख्यकों की प्राथमिकता हो सकती है. इसका लाभ कांग्रेस मुलायम गठजोड़ को मिल सकता है.

लेकिन मुख्यमंत्री मायावती मुस्लिम समुदाय में अमरीका के प्रति नाराज़गी का फ़ायदा उठाने की पूरी कोशिश करेंगी.

मायावती और मुलायम दोनों के लिए अगले लोकसभा चुनाव में अधिक से अधिक सांसद जिताना ही इस समय सबसे बड़ा लक्ष्य है, जिससे दिल्ली की अगली सरकार बनाने में उनकी भूमिका निर्णायक हो.

मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह
मुलायम सिंह और अमर सिंह यूपीए सरकार के लिए संकटमोचक बनकर सामने आए

मायावती ने इससे पहले विधानसभा चुनाव के लिए तो दो बार गठबंधन किया था. 1993 में समाजवादी पार्टी के साथ और 1996 में कांग्रेस के साथ. लेकिन लोकसभा के लिए वह पहली बार गठबंधन करने के मूड में हैं.

कहा जा रहा है कि मायावती ज़ल्दी ही लोकदल के दो विधायकों को अपनी सरकार में शामिल करेंगी और अजित सिंह के साथ मिलकर अगला लोकसभा चुनाव लड़ेगी.

बस इसमें एक ही प्रश्नचिह्न है कि जाट और जाटव समुदाय में जिस तरह सामजिक टकराव है, उससे यह गठबंधन कितना कामयाब होगा.

भविष्य के संकेत

कहा जाता है कि कांग्रेस पार्टी अजित सिंह को केंद्र में मंत्री बनाने को तैयार थी, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव दो देखते हुए अजित ने मायावती के साथ रहना बेहतर समझा.

मायावती के लिए यह भी एक चुनौती होगी कि विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण और अन्य जिन ऊंची जातियों का वोट उन्हें मुलायम सरकार और माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ मिला था. वह तबका इलाहाबाद से माफिया सांसद अतीक अहमद और ऐसे अनेक लोगों के साथ आने से कहीं रूठ न जाए.

बहरहाल मायावती उन नेताओं में नहीं जो आसानी से हार मान लें. एक बयान में उन्होंने कहा है कि एक दलित की बेटी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कांग्रेस और भाजपा एक हो गए और इसी साज़िश के कारण मनमोहन सरकार संसद में बच गई.

मायावती का कहना है कि इस घटनाक्रम से वह कांग्रेस और भाजपा विरोधी ताक़तों कि धुरी बनकर उभरी हैं. उन्हें पिछले छह दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ा राजनीतिक फ़ायदा मिला है.

मनमोहन सरकार के संसद में शक्ति परीक्षण ने मायावती को केंद्रीय राजनीति में आने का एक बेहतरीन मौक़ा ज़रूर दे दिया है. अभी तक केवल बसपा के लोग ही मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात करते थे.लेकिन अब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के नेता चन्द्रबाबू नायडू और कम्युनिस्ट नेताओं ने भी उन्हें अपना नेता मान लिया है.

अगर मायावती इसी तरह तीसरे मोर्चे का नेता बनी रहती हैं, तो तात्कालिक झटके के बावजूद अगले लोकसभा चुनाव के बाद खंडित जनादेश की स्थिति में वह एक निर्णायक भूमिका में हो सकती हैं.

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