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बहन जी की सरकार का एक साल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक साल पहले जब मायावती ने तीस फीसदी वोट और विधान सभा मे स्पष्ट बहुमत लेकर मुलायम सिंह यादव से सत्ता छीनी थी, उस समय राज्य के लोगों को उनसे अच्छी सरकार चलाने यानी सुशासन की बड़ी उम्मीदें थीं. उत्तर प्रदेश की सफलता से उत्साहित सुश्री मायावती प्रशासन अफसरों के भरोसे छोड़ प्रधानमंत्री बनने के लिए देशव्यापी अभियान पर निकल पड़ीं. दिल्ली मे राजनीतिक टीकाकार यह कयास लगा रहे हैं कि अगर मायावती अगले लोक सभा चुनाव मे पचास साठ सीटें जिता लेती हैं तो वह प्रधानमंत्री या कम से कम उपप्रधानमंत्री बन सकती हैं. मुख्यमंत्री का कहना है कि एक साल की अवधि में उनकी सरकार ने ''अपने वायदे के मुताबिक राज्य को जंगल राज और गुंडा टैक्स के माहौल से निकालकर यहाँ की लगभग 17 करोड़ की आबादी को कानून द्वारा कानून का राज देने का प्रयास किया तथा विकास के लिए एक सकारात्मक वातावरण व जन सुविधाओं का भरपूर आधार तैयार किया जिससे लोगों को एक सुखद अनुभूति हुई.'' सरकार का एक साल पूरा होने पर प्रकाशित एक पुस्तिका मे कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में पिछला एक साल विकास एवं प्रगति का रहा है और सरकार के कदम सामाजिक लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं. विज्ञापन और होर्डिंग तेरह मई को एक साल पूरा होने पर सरकार ने अख़बारों मे अपनी उपलब्धियों के बड़े बड़े विज्ञापन दिए और सड़कों पर होर्डिंग्स लगवाईं. इस अवसर पर एक जलसे को संबोधित करते हुए मुख्यमत्री ने कई निर्णयों का जिक्र करते हुए उन्हें ऐतिहासिक बताया. इनमें नोएडा से बलिया तक गंगा एक्सप्रेस्वे सड़क, सरकारी नौकरियों मे आरक्षण का बैकलाग कोटा पूरा करना , सरकारी सहायता प्राप्त निजी उद्योगों मे आरक्षण लागू करना , गावों मे एक लाख से अधिक सफाई कर्मियों की भरती, 88000 प्राथमिक अध्यापकों की भर्ती तथा अनेक सड़कों, पुलों और अस्पतालों का निर्माण स्वीकृत करना शामिल है. बुंदेलखंड मे ददुआ डाकू का खात्मा और भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत की गिरफ्तारी को सरकार बड़ी उपलब्धि मानती हैं. हाल के उपचुनावों मे जीत से उनके हौसले बुलंद हैं. मुख्यमंत्री का कहना है कि उन्होंने इस एक साल मे उत्तर प्रदेश मे क़ानून का राज स्थापित किया है और अनेक लोक कल्याणकारी योजनाएँ शुरू की हैं जिनसे जनता खुश है और उपचुनावों मे सफलता इसका सबूत है. लेकिन यहाँ उत्तर प्रदेश मे जिन उच्च या मध्यमवर्गीय मतदाताओं ने मुलायम सिंह को हराने के लिए भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस का परित्याग कर मायावती का साथ दिया था उनमे अब उम्मीदों की जगह निराशा ने ले ली है. मायावती के अंध भक्त माने जाने वाले दलित वर्गों मे भी कहीं कहीं कसमसाहट और असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे हैं. चुनाव के दौरान मायावती ने अपने जिस हाथी को गणेश बताकर एक लोक कल्याण कारी शासन का वादा किया था, लोगों की नजर मे वह हाथी अब दौलत तथा जमीने हथियाने और विध्वंस का माध्यम बन गया है. दोस्ती का हाथ जिस कांग्रेस पार्टी ने मुलायम को कटाने के लिए मायावती को बढावा दिया था, वही कांग्रेस पार्टी अब माया की काट के लिए मुलायम से दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है. कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि मायावती की भारतीय जनता पार्टी से अन्दर अन्दर सांठ गाँठ हो गयी है और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए ही बहुजन समाज पार्टी दूसरे राज्यों मे अपनी पार्टी को चुनाव लड़वा रही हैं.
सरकार संभालने के बाद मायावती ने घोषणा की थी कि उनके राज मे रोज रोज अफसरों के तबादले नहीं होंगे, लेकिन हर हफ्ते या कभी कभी हर रोज ही वरिष्ठ अधिकारी इधर से उधर तबादले पर भेजे जा रहे हैं. प्रशासन की धुरी मुख्य सचिव के बजाय नव सृजित पद कैबिनेट सचिव पर बैठे कैप्टन शशांक शेखर सिंह हैं जो आई ऐ एस अफसर न होकर पायलट हैं . इसके चलते नौकरशाही मे अन्दर ही अन्दर असंतोष और घुटन के स्वर सुनाई देते हैं. मुलायम सरकार मे भर्ती हुए अठारह हजार से ज्यादा सिपाही बर्खास्त कर दिए गए और डेढ़ सौ से ज्यादा पुलिस अफसर सिपाही भरती मे कथित भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे हैं. जाहिर है पुलिस फोर्स भी मन से बहुत खुश नहीं है. राज्य मे निजी पूँजी निवेश और विकास को बढावा देने के लिए मुख्यमंत्री ने बडे जोर शोर से ने कृषि नीति घोषित की थी जिसमे अनुबंध यानी कांट्रेक्ट खेती और रिटेल मार्केटिंग की बात कही गयी थी. लेकिन चंद दिनों मे ही इसे वापस लेकर रिलायंस फ्रेश स्टोर बंद करा दिए गए. जानकारों का कहना है कि इस एक कदम से उत्तर प्रदेश मे पूँजी निवेश के इच्छुक बड़े उद्योगपतियों का विश्वास डगमगा गया. विश्वविद्यालयों और डिग्री कालेजों मे शिक्षा का माहौल सुधारने के लिए माया सरकार ने छात्र संघ चुनावों पर रोक की घोषणा की थी, लेकिन अपने इस कदम को भी मुख्यमंत्री ने वापस ले लिया. इस एक साल के दौरान माया सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है बलिया से नोएडा तक गंगा के किनारे एक हजार किलोमीटर लम्बी सड़क बनाने का जिस पर चलने के लिए पैसा देना होगा. इस परियोजना से किसानों और पर्यावरण वैज्ञानिकों मे गंभीर चिंता है. किसानों की शिकायत उत्तर प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी किसानों और खेत मजदूरों की है. न्यूनतम मजदूरी की दर बढाकर सौ रुपये करने से मजदूर तो खुश हैं लेकिन किसानों को शिकायत है कि उन्हें समय से खाद बीज और सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली नहीं मिली. पूर्वांचल मे कई मिलें बंद होने से गन्ना किसानों को परेशानी हुई. भुगतान को लेकर भी मिलें आनाकानी कर रही हैं. अखबारों मे लगातार खबरें छपीं कि किसानों को आलू मिट्टी के मोल बेचना पड़ा. पिछली बार की तरह इस बार भी मुख्यमंत्री मायावती ने बिल्कुल ख़ास राजधानी क्षेत्र मे एक और बड़ा सरकारी बँगला लेकर पार्टी का आलीशान दफ्तर बना दिया. पिछली सरकार मे सौ करोड़ से अधिक लागत से बने अम्बेडकर स्मारक और बगल मे बने स्टेडियम को दैनामाईट से तोड़ कर अब उसे करीब बारह सौ करोड़ की लगत से ऐसा नया रूप दिया जा रहा है जो मायावती के मुताबिक हजार साल तक सुरक्षित रहे. यहीं पास मे मायावती ने गुरु कांशीराम के साथ अपनी आदमकद मूर्ति भी लगा दी है. जेल रोड पर पुराना अम्ब्देकर रैली स्थल तोड़कर करीब ढाई सौ करोड़ की लागत से कांशीराम स्मारक बनाया जा रहा है. और आवासीय योजना के लिए अधिगृहीत जमीन पर एक विशाल रैली स्थल नए सिरे से बनाया जा रहा है. इस सब के चलते चारों तरफ़ बुलडोज़र, मलवा और पत्थर ही पत्थर दिखायी देते हैं. कई लोग इसे पैसे की बर्बादी कहते हैं, मगर मायावती के समर्थक दलित समुदाय के लोग इन्हें देखकर गौरव महसूस करते हैं. प्रेक्षकों का कहना कि इस तरह दलित प्रतीकों के महिमामंडन से मायावती का अपना प्रतिबद्ध वोटर खुश होता है. पर खतरा यह है कि जो उच्च मध्यम वर्ग पिछले विधान सभा चुनाव मे मायावती से जुडा था और जिसके चलते उनका वोट बढ़कर तीस फीसदी हुआ अगर उनका मोह भंग हुआ तो फ़िर चुनाव मे वैसी सफलता नहीं मिलेगी जैसी पिछली बार मिली थी. सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के ही विधायक कहते हैं कि सरकार मे सारे महत्त्वपूर्ण फैसले पंचम तल यानी मुख्यमंत्री सचिवालय मे लिए जा रहे हैं किसी मंत्री की हैसियत नहीं कि वह स्वतंत्र रूप से कोई निर्णय ले या खुलकर अपनी बात कह सके. मंत्रियों और पार्टी पधाकारियों को प्रेस से बात करना भी मना है. दर्शन दुर्लभ आम कार्यकर्ता तो दूर विधायक और सांसद भी मुख्यमंत्री से मिलने को तरसते हैं. मायावती पहले के मुख्यमंत्रियों की तरह जनता दर्शन मे भी लोगों से नहीं मिलतीं. और न ही वह किसी सामाजिक या प्रोफेशनल संगठन के जलसे मे जाती हैं. टी वी और अखबार उनके मुख्य सूचना श्रोता हैं. लेकिन वह न तो पत्रकार्रों को इंटरव्यू देती हैं और न ही प्रेस कांफ्रेंस मे सवाल पूछने का मौका. कहा जा रहा है कि कई अखबार मालिकों ने अपने संपादकों को आलोचनात्मक खबरों से बचने को कहा है.
शुरू मे कुछ लोग जन हित याचिका के जरिये अदालत गए और हाईकोर्ट ने सरकार पर कुछ बंदिशें लगाईं. मगर बाद मे सुप्रीम कोर्ट ने मायावती सरकार के विवादास्पद फैसलों पर मुहर लगा दी. गवर्नर टी राजेश्वर राव ने न केवल ताज कोरिडोर मामले मे उन पर भ्रष्टाचार का मुक़दमा चलाने की सी बी आई की अर्जी नामंजूर की, बल्कि वह पहले की तरह सरकार के फैसलों पर नुक्ताचीनी से भी बच रहे हैं. इन सबसे माना जा रहा कई मायावती पहले से ज्यादा ताक़तवर हो गई हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिर रहा है. प्रेक्षकों का कहना है अगर मायावती ने अपना ध्यान प्रशासन को सुधारने और लोगों की बुनियादें जरूरतें जैसे सुरक्षा, रोजगार, बिजली और पानी उपलब्ध कराने पर न लगाया सारा दोष केवल केन्द्र सरकार या पिछली मुलायम सरकार पर डालती रहीं, तो अगले लोक सभा चुनाव मे उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें मायावती नेता चुनी गईं, दावा पेश करेंगी11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस नए समीकरण गढ़ने वाली माया11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस यूपी में दलितों की हत्या पर राजनीति14 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस 'ज़रूरी थी टिकैत की गिरफ़्तारी'02 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस हाईकोर्ट ने मायावती की परियोजनाएँ रोकीं04 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस मायावती ने कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी07 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस 'मान्यवर' और माया की मूरत 14 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस केंद्र को चेतावनी और राहुल को नसीहत19 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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