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रविवार, 20 जुलाई, 2008 को 11:27 GMT तक के समाचार
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खनन के विरोध में डटे आदिवासी

डोंगरिया कोंध जनजाति की महिला
पाँच सौ परिवारों को उनकी ज़मीन से बेदखल कर दिया गया है
उड़ीसा के सुदूर इलाक़े में एक गाँव है गोलगोला जहाँ तांत्रिक अब भी देवता के लिए बलि चढ़ाते हैं.

वहाँ लोगों के विश्वास के अनुसार पहाड़ अब भी पवित्र हैं लेकिन उन्हें डर है कि उनके जीने का तरीक़ा ख़तरे में है.

गोलगोला तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं है. सिर्फ़ हरी-भरी घाटी से होकर गुज़रने वाला एक कच्चा रास्ता है. इसके दोनों तरफ़ जंगलों से भरी नियमगिरि पहाड़ियाँ हैं.

इसके बाद आप जंगल में घुसते हैं जहाँ बाँस के झुरमुट और कटहल और आम के फलों से लदे हुए पेड़ों के नीचे से रास्ता गुज़रता है.

क़रीब दो घंटों तक खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है जो बहुत मुश्किल लगता है. हवा में नमी से आने वाला पसीना जल्दी ही बदन को भिंगो देता है.

ऊपर पहाड़ियों पर पत्थरों का ढेर है और उसके पास आदमयुग के महिलाओं और पुरुषों की कुछ छोटी मूर्तियाँ भी.

यही वह जगह है जहाँ जंगल में औषधीय पौधों को एकत्र करने से पहले डोंगरिया कोंध जाति के लोग अपने देवता की आराधना करते हैं.

इसके बाद आती हैं लकड़ी की अनूठी आकृतियाँ, जिन पर फलों का चढ़ावा चढ़ा होता है. यहाँ आकर हवा में जादू का सा अहसास होता है. यह स्थान किसी दूसरी दुनिया की तरह प्रतीत होता है जहाँ कानों में जंगल से होकर ड्रम की आवाज़ आती रहती है.

आख़िरकार आप गोलगोला पहुँच ही जाते हैं. यह मिट्टी के एक खुले मैदान के बीच बसा हुआ एक छोटा सा गाँव है.

तंत्र मंत्र की दुनिया

जैसे ही हम गाँव में घुसे, लाल कपड़े पहने हुए एक महिला तांत्रिक नाच रही थी. वह किसी दूसरी ही दुनिया में थी और एक से दूसरे घर के चक्कर लगा रही थी.

उसके बाल काफ़ी लंबे और उलझे हुए थे. उसके गले में मोतियों और घोंघों की लंबी और भारी मालाएँ लटकी हुई थीं.

जनजातियाँ
बच्चों के लिए शिक्षा के कोई साधन नहीं हैं.

उसके एक ओर उसका एक सहायक और पीछे दो युवा लड़के थे जिनके सिर पर फलों से भरी टोकरी थीं.

हर दरवाज़े पर खड़े परिवार के लोग उस तांत्रिक को एक छोटी मुर्गी देते और वह उसे लेकर कुछ मंत्र पढ़ती.

उसके बाद वह एक ही झटके में मुर्गी का सिर धड़ से अलग कर देती और उसका ख़ून चढ़ाए गए चावलों में मिल जाता. इसके साथ ही ढोल बजने लगते.

तांत्रिक महिला नंगे पैर नाच रही थी और उसके पैर मिट्टी से सने हुए थे.

गाँव में सभी डोंगरिया कोंध जाति की महिलाएं नाक और कानों में अनेक नथ पहने हुए थीं और ज़्यादातर पुरुष कटहल से बनी शराब के नशे में धुत थे.

नियमगिरि का महत्व

आज डोंगरिया कोंध जनजाति के सिर्फ़ 7,950 लोग बचे हैं.

डोंगरिया उड़ीसा के दूरस्थ हिस्से में स्थित नियमगिरि के जंगलों में सदियों से रह रहे हैं. वे फल एकत्र कर, ज्वार-बाजरा की खेती कर और जंगल के पौधों को शहरों-कस्बों में बेच कर अपना जीवन यापन करते हैं.

गोलगोला से आधुनिक दुनिया अभी कोसों दूर है. वहाँ अभी न तो बिजली है, न स्कूल हैं, न टीवी है और न ही टेलीफ़ोन.

डोंगरिया कोंध के लिए काम करने वाले एक युवा कार्यकर्ता जीतू जकेस्किया कहते हैं, "हम जंगल में मिलने वाली हर चीज़ जैसे फलों को बाज़ार ले जाते हैं. यह डोंगरिया कोंध लोगों के जीवन के स्त्रोत की तरह है."

वह इस जाति के उन कुछ लोगों में से एक हैं जिन्होंने औपचारिक शिक्षा ग्रहण की है और वह अब अपनी जनजाति के जीने के तरीक़े को सुरक्षित रखने के लिए लड़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, "हम इन फलों को पाने के लिए कोई पैसा नहीं देते हैं. हमें यह मुफ़्त में मिलते हैं. यह हमारे लिए स्वर्ग के समान है."

डोंगरिया जीववादी होते हैं. उनके अनुसार हर पहाड़ किसी ख़ास देवता का निवास होता है.

एल्युमिनम शोधन संयंत्र

उनके अनुसार, "नियमगिरि पहाड़ डोंगरिया लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थल है. यह नियम राजा के मंदिर की तरह है. इसीलिए हम लोग प्रकृति की पूजा करते हैं और हमें प्रकृति को बचाना है."

कार्यकर्ता जीतू जकेस्किया
जीतू कहते हैं कि जंगल उनके लिए स्वर्ग के समान है

लेकिन ब्रिटेन की बड़ी कंपनियों में से एक वेदांत रिसोर्सेज़ की एक शाखा नियमगिरि पहाड़ से खनिजों का खनन करना चाहती है.

यह क्षेत्र बॉक्साइट से भरा हुआ है जिससे एल्युमीनियम बनाया जाता है. आलोचकों का कहना है कि इन पहाड़ियों के खनन से पर्यावरण को भारी नुक़सान होगा. और साथ ही डोंगरिया जाति के जीने का तरीक़ा भी प्रभावित हो सकता है.

लेकिन वेदांत इन पहाड़ियों के बहुत पास तक पहुँच गई है. वेदांत की भारतीय सहायक कंपनी वेदांत एल्युमीनियम लिमिटेड ने तो लांजीगंज में एक अरब डॉलर की पूंजी लगाकर बड़ा एल्युमीनियम शोधन संयंत्र लगा भी लिया है.

यह स्थान नियमगिरि पहाड़ की तराई में ही क़रीब छह वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है.

उड़ीसा सरकार ने वेदांत को पहाड़ों से बॉक्साइट खनन की इजाज़त दे दी है लेकिन जब तक भारत का सर्वोच्च न्यायालय इसकी इजाज़त नहीं दे दे, तब तक वहाँ खनन शुरू नहीं किया जा सकता.

तब तक वेदांत की इस इकाई में काम जारी रखने के लिए दूसरे स्थानों से रेल या ट्रक के माध्यम से बॉक्साइट के लाल पत्थर लाए जा रहे हैं.

विकास की संभावनाएँ

उड़ीसा भारत के सबसे ग़रीब राज्यों में से एक है लेकिन खनिज संपदा के मामले में सबसे प्रचुर भी है. इसलिए राज्य सरकार इसकी इन संभावनाओं को भुनाना चाहती है.

वेदांत एल्युमिनियम लिमिटेड के मुख्य ऑपरेटिंग अधिकारी डॉ मुकेश कुमार कहते हैं, "अगर हम कच्चा लोहा, एल्युमीनियम और कोयले को देखें तो हम कह सकते हैं कि ऑस्ट्रेलिया की तुलना में उड़ीसा में 60 से 70 फ़ीसदी भंडार है."

उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अब तक विकसित नहीं हुए हैं. एक बार हम खनिज निकालने लगें तो वह दिन दूर नहीं होगा जब हम उड़ीसा को ऑस्ट्रेलिया की तरह विकसित पाएँगे."

और वेदांत के पास इसके लिए बड़ी-बड़ी योजनाएँ हैं.

उड़ीसा में पाया जाने वाला बॉक्साइट बहुत ऊँची गुणवत्ता वाला है जिसके शोधन का काम अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है. वेदांत चाहता है कि उनकी यह इकाई दुनिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी इकाई के रूप में विकसित हो.

इस धातु का इस्तेमाल चॉकलेट और दूसरे अनेक खाद्य पदार्थों को लपेटने के काम में किया जाता है. इसके दूसरे बड़े ग्राहकों में ऑटो उद्योग है.

क़ानून का उल्लंघन

ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो नियमगिरि पहाड़ के खनन के विरोध में हैं.

भारत का वाइल्ड लाइफ़ इंस्टीट्यूट कहता है कि खनन से पर्यावरण को ऐसा नुक़सान होगा जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती.

वेदांत शोधन संयंत्र
बॉक्साइट का खनन करने के लिए उच्चतम न्यायालय की अनुमति चाहिए

इस परियोजना की जाँच करने वाली उच्चतम न्यायालय की एक समिति का कहना है कि वेदांत एल्युमीनियम ने शोधन संयंत्र लगाकर वन संरक्षण क़ानून का उल्लंघन किया है.

इस क्षेत्र में जाँच करने वाली नॉर्वे की आधिकारिक नैतिकता काउंसिल ने वेदांत रिसोर्सेज़ को मानव अधिकारों और वर्तमान और भविष्य में पर्यावरण को होने वाले नुक़सान के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.

नॉर्वे की सरकार ने अपने पास मौजूद वेदांत के 140 लाख डॉलर के सभी शेयर बेच दिए हैं.

इन सभी आरोपों को झूठे बताते हुए वेदांत का कहना है कि इससे पर्यावरण को कोई ख़तरा नहीं है. उनका कहना है कि वे सतह से सिर्फ़ 10 से 15 मीटर तक खनन का काम करेंगे और वह भी पहाड़ के कुछ ख़ास हिस्सों में ही. और काम ख़त्म होने के बाद वे इन हिस्सों को भर भी देंगे.

मुकेश कुमार करते हैं, "हम नहीं समझते कि किसी और के पास पर्यावरण के हमसे बेहतर मानक हो सकते हैं."

उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि पहले पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित हो, स्थानीय लोगों का विकास और सहभागिता और सुरक्षा सुनिश्चित हो. हमारे यही चार मूल सिद्धांत हैं. अगर हम इन्हें नहीं निश्चित कर पाते तो किसी परियोजना में हमारी रुचि नहीं है."

मानवाधिकार उल्लंघन

उन्होंने परिशोधन संयंत्र के क्षेत्र पर रहने वाले लोगों को अन्यत्र बसाया है. उस छोटे से गाँव में बनी कंक्रीट की झोपड़ियों में करीब सौ परिवार बसे हुए दिखे.

इस संयंत्र में दो हज़ार लोगों को रोज़ग़ार मिला है. कंपनी का कहना है कि वे क्षेत्र में विकास और नौकरियों के साथ स्वास्थ्य सुरक्षा और शिक्षा भी ला रहे हैं.

डॉ मुकेश कुमार कहते हैं, "अगले कुछ सालों में आप यहाँ अदभुत बदलाव देखेंगे."

लेकिन वहाँ जाने पर देखा कि क़रीब 80 ग्रामीणों ने संयंत्र के गेट को घेरा हुआ था और वे ट्रकों को अंदर नहीं जाने दे रहे थे.

पाँच सौ परिवारों को उनकी उस ज़मीन से बेदखल कर दिया गया है जिस पर संयंत्र बना है और उनका कहना है कि उन्हें उचित मुआवज़ा नहीं दिया गया है.

वेदांत का कहना है कि उनके आरोप झूठे हैं और वे ज़्यादा पैसा पाने के लिए ऐसा कह रहे हैं.

संयंत्र के आसपास के गाँवों में जाने पर लोगों ने बताया कि उनके घर और खेत ज़बरन हड़प लिए गए हैं और विरोध करने पर उन्हें पुलिस मारती है.

उच्चतम न्यायालय की समिति भी अपनी रिपोर्ट में ऐसे ही दावे करती है कि जो लोग ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं हुए उन्हें किराए पर लिए गए गुंडों से डराया, धमकाया और पीटा गया.

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