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शनिवार, 16 सितंबर, 2006 को 14:08 GMT तक के समाचार
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चोरी के आरोप में 'अग्निपरीक्षा'

राजस्थान
मामला अंधविश्वास का बताया गया है
राजस्थान के एक गाँव में लोगों को चोरी के आरोप से बेदाग़ साबित होने के लिए अग्नि परीक्षा से गुज़रना पड़ा है. इस परीक्षा में गांव के 50 से ज़्यादा लोगों के हाथ जल गए.

यह घटना रविवार को चितौड़गढ़ ज़िले के आदिवासी बहुल राणपुर गाँव में हुई. पुलिस ने इस अग्नि परीक्षा का आयोजन करने वाले पाँच लोगों को गिरफ़्तार कर लिया है.

ऐसा पंचायत के निर्णय पर किया गया था. घटना के दिन गाँव में पंचायत जुटी और स्थानीय सरकारी स्कूल में मिड-डे मील यानी मध्याह्न भोजन के पोसाहार की चोरी का पता लगाने का फ़ैसला किया.

स्कूल से डेढ़ क्विंटल गेहूँ और 80 किलो चावल चोरी हो गया था. इसकी पुलिस थाने में रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई थी पर चोरों का पता नहीं लगा.

पुलिस के अनुसार पंचायत ने बड़ा बर्तन मंगवाया और उसमें गरम तेल पलट दिया. इस तेल में अंगूठी डाल दी गई.

इसके बाद लोगों से कहा गया कि इस खौलते तेल में हाथ डालकर अंगूठी निकाले. अगर हाथ जल गया तो आप चोर हैं, नहीं तो बेक़सूर.

कार्रवाई

बकौल पुलिस कम से कम 50 लोगों के हाथ जलने की ख़बर है. चूंकि यह पूरा मामला अंधविश्वास का था इसलिए जिसने भी हाथ डाला जल गया.

अब गाँव में दर्जनों लोग जले हुए हाथों के साथ धूम रहे हैं. प्रशासन ने वहाँ मेडिकल दल भेजा है.

 ये पंचायतें समानांतर न्याय व्यवस्था चला रही हैं. इनके फैसले जातिगत पूर्वाग्रह और भेदभावपूर्ण होते हैं. सरकार को क़ानून बनाकर ऐसी पंचायतों को रोकना चाहिए
थान सिंह, अध्यक्ष-पीयूसीएल

चितौड़गढ़ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेंद्र सिंह ने बीबीसी को बताया कि इस सिलसिले में पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

एक सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि राणपुर के निकट देवगढ़ के थानाधिकारी, पटवारी और ग्राम सेवक को लापरवाही के आरोप में निलंबित कर दिया गया है.

उधर मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि ग्रामीण राजस्थान में ऐसी पंचायतों का लगातार आयोजन किया जा रहा है लेकिन सरकार इनकी अनदेखी कर रही है.

क्षेत्र के पूर्व सांसद और मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के अध्यक्ष थान सिंह कहते हैं, "ये पंचायतें समानांतर न्याय व्यवस्था चला रही हैं. इनके फैसले जातिगत पूर्वाग्रह और भेदभावपूर्ण होते हैं. सरकार को क़ानून बनाकर ऐसी पंचायतों को रोकना चाहिए."

उधर जाति पंचायतों में यक़ीन रखने वाले कहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में घटनाओं की जाँच रफ़्तार धीमी है और फैसलों में कई वर्ष लग जाते हैं.

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