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बुधवार, 05 जनवरी, 2005 को 03:28 GMT तक के समाचार
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स्कूल फिर खुले तो मगर...
थाईलैंड के फुकेट में स्कूली बच्चे
बहुत से स्कूल ही राहत शिविर बन गए हैं
हिंद महासागर में 26 दिसंबर को आए भूकंप और सूनामी लहरों की तबाही से उबरकर मंगलवार को कुछ देशों में स्कूल फिर से खुले.

इस हादसे में बहुत से स्कूल भी तबाह हो गए और जो बचे उनमें राहत शिविर बनाए गए, ख़ासतौर से भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह में ज़्यादातर स्कूल शरणार्थी शिविर बनकर रह गए.

भारत के अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में स्कूलों में प्रभावितों को ठहराया गया तो वहाँ के बहुत से लोगों ने शहरी जीवन की झलक पहली बार देखी.

बहुत से ऐसे बच्चे भी स्कूलों में फिर से आए जिनके अभिभावक और माता-पिता इस प्राकृतिक आपदा में खो चुके हैं.

बहुत से बच्चों को आपबीती बताने को प्रोत्साहित किया गया ताकि उनके अंदर का दुख और निराशा बाहर निकल सके और वे ज़िंदगी को सामान्य बना सकें.

पोर्ट ब्लेयर में एक हाईस स्कूल के प्रिंसिपल सुशील सिंह का कहना था, "बच्चे बहुत डरे हुए हैं, वे अब भी अक्सर महसूस करते हैं कि जैसे भूकंप और समुद्री तूफ़ान आ रहा है और रात को इमारत से बाहर निकलकर भागने लगते हैं. हम उन्हें क्रिकेट और फुटबाल खेल के ज़रिए सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं."

इंडोनेशिया में मौजूद बीबीसी संवाददाता डैन इसाक्स का कहना है कि वहाँ भी अन्य प्रभावित देशों की तरह मंगलवार को स्कूल खुले लेकिन हालात सामान्य नहीं नज़र आए.

अंडमान निकोबार में बच्चे
बच्चों की आँखों में दहशत भरी है

वहाँ अध्यापक बच्चों की देखभाल करने वालों को इस बात के लिए राज़ी करने की कोशिश करते नज़र आए कि वे बच्चों को स्कूलों में लाएँ ताकि वे अपनी भावनाओं के बारे में बातें कर सकें.

अनेक स्थानों पर बच्चों को उस हादसे से उबारने के लिए बाल मनोवैज्ञानिकों का भी सहारा लिया जा रहा है और वे बच्चों के अंदर ठहरे डर और दहशत को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को सामान्य होने में काफ़ी वक़्त लगेगा.

संयुक्त राष्ट्र की बाल आपदा कोष संस्था यूनिसेफ़ ने भी कहा है कि बच्चों को जितना जल्दी हो सके, स्कूल में भेजना शुरू किया जाए ताकि वे हादसे को भूलकर सामान्य ज़िंदगी के रास्ते पर चल सकें.

यूनिसेफ़ ने यह भी कहा है कि इस प्राकृतिक हादसे में मारे गए क़रीब डेढ़ लाख लोगों में से एक तिहाई यानी क़रीब पचास हज़ार बच्चे हैं और जो जीवित बचे हैं उन पर भी बहुत से ख़तरे मँडरा रहे हैं.

यूनिसेफ़ ने कहा है कि बच्चों को हादसे से उबारने और उनके टिकाऊ और भावनात्मक पुनर्वास का काम सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ होना चाहिए.

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