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अंडमान में जनजातियों को ख़तरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सूनामी लहरों की विनाशलीला से दुनिया की सबसे पुरानी आदिम जनजातियों का अस्तित्व ख़तरे में पड़ गया है. भारत के ऑन्थ्रोपोल़जिकल सर्वे का मानना है कि अभी तक इनके बारे में कोई सूचना नहीं मिली है. अगर ये जनजातियाँ लुप्त हो गईं तो ये एक बड़ी क्षति मानी जाएगी. हालाँकि भारत के रक्षा मंत्री का कहना है कि इनमें से ज़्यादातर ऐसे इलाक़ों में रहते थे जहाँ सूनामी लहरें नहीं पहुँची लेकिन पर्यावरणविद् और विशेषज्ञ इस दावे को मानने से इनकार करते हैं. लैंड ऑफ 'नेकेड पीपुल' की लेखिका और साईंटिफिक अमेरिकन की पूर्व संपादक मधुश्री मुखर्जी का कहना है, "केवल एक एयरफोर्स के पायलट के ये कहने से कि उसने कुछ कबीले वालों को एक तट पर मदद के लिए हाथ हिलाते देखा था, इससे कुछ साबित नहीं होता." उनका कहना है कि इस त्रासदी ने निकोबार के कबीलों को काफी नुकसान पहुँचाया है. ख़ास तौर पर शॉम्पेन जाति के लोगों को नुकसान पहुँचा होगा क्योंकि उनका इलाक़ा सूनामी के रास्ते में पड़ता है. मधुश्री कहती हैं, "मुझे अपने सूत्रों से ये भी पता चला है कि ओंगी कबीले के 40 लोगों को अंडमान से सुरक्षित निकाल लिया गया है, लेकिन बाक़ी का कुछ पता नहीं है." पर्यावरणविद् पंकज सेकसरिया का कहना है, "सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि वे सुरक्षित हैं. सरकार के पास उनकी ख़ैर-ख़बर जानने का कोई ज़रिया नहीं है. वैसे भी सरकार का ध्यान अभी बचाव कार्य में ही लगा है." सोसायटी फॉर अंडमान निकोबार चलाने वाले समीर आचार्य का मानना है कि सूनामी ऐसे समय आया जब कबीले वाले कछुओं का शिकार करने तटों पर जाते हैं. अगर इस समय उन पर लहरों का कहर बरपा होगा तो उनका बचना मुश्किल ही होगा. पंकज सेकसरिया का कहना है कि अगर वे बच भी गए तब भी उन्हें ख़तरे से बाहर नहीं माना जा सकता, "अगर महामारी फैल गई तो उनकी पूरी प्रजाति गायब हो जाएगी." अंडमान में शॉम्पेन जनजाति के 200-250 लोग, जारवा के 100, ओन्गी के 105, ग्रेट एंडमानिस के 40-45 और सेन्टेलीज़ के क़रीब 250 लोग नेगरीटो कबीले से हैं, जो दक्षिण एशिया की प्राचीनतम जनजाति है. |
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