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क्या धमाकों का धर्म से कोई ताल्लुक है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक और बम धमाका, कुछ लोगों की मौत कुछ लोग घायल. इस बार शहर का नाम जयपुर. लेकिन क्या वाकई अब ऐसा नहीं लगता है कि नामों मे क्या रखा है. नाम चाहे हैदराबाद, मालेगाँव, वाराणसी या मुंबई हो और बम के लिए आरडीएक्स का इस्तमाल किया गया हो या अमोनियम नाइट्रेट का. इससे क्या फ़र्क पड़ता है. हर बार हर जगह होता यही है सिलसिलेवार ढंग से पाँच-सात धमाके और बेगुनाह लोंगों की मौत. उसके बाद शुरू होता है वही जानी पहचानी बातों का सिलसिला. हमलों की निंदा फिर उनसे लड़ने का आश्वासन, नेताओं का दौरा और आख़िर मे मरने वालों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा. धमाका अगर विपक्षी पार्टी की सरकार वाले राज्य मे हुआ है तो फिर शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का दौर जिसको जो फायदेमंद लगता है वो पार्टी वही करती है या कहती है. रिश्तों पर असर लेकिन राजनीतिक नफ़ा नुकसान से हटकर ऐसे हादसों का असर आम लोगों के आपसी रिश्तों पर भी पड़ता है. किसी भी बम धमाके की ख़बर आते ही एक पूरा समाज या खुलकर कहा जाए तो मुस्लिम समाज शक के घेरे मे आ जाता है. शक का ये असर बाज़ारों में, दफ़्तरों में या फिर ट्रेनों मे दिखता है. दो समुदायों के लोगों के दरमियाँ एक अजीब सी खामोशी एक अजीब सा डर दिखने लगता है.
ऐसे हादसों के बाद एक बात जो बहुत ज़ोरों से की जाती है वो है वोट बैंक की राजनीति. भारत की राजनीति पर नज़र रखनेवाले विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि अब तो आम आदमी भी समझता है की वोट बैंक का मतलब भारत मे रह रहे मुसलमान हैं. एक आम सी धारणा बन गई है कि मुसलमानों के वोट के कारण कांग्रेस पार्टी कोई कड़े क़ानून नहीं बनाती है. और ये केवल बीजेपी या दूसरे हिंदूवादी संगठन ही नहीं कहते बल्कि बहुत हद तक भारतीय मीडिया भी उसी प्रवाह मे बहती हुई दिखाई पड़ती है. बम का धर्म से क्या ताल्लुक? इस तरह से तस्वीर पेश की जाती है कि जितने भी बम धमाके होते हैं उसके पीछे पाकिस्तान या बांग्लादेश का हाथ है और वे इस तरह की कार्रवाई कुछ भारतीय मुसलमानों की मदद से करते हैं. हालाँकि 1993 मे हुए मुंबई बम धमाकों के अलावा कुछ एक को छोड़ हाल के किसी भी बड़े धमाके की जाँच मे अभी तक कोई ख़ास प्रगति नही हुई है. बम के विशेषज्ञ ये बताते हैं कि सच्चाई तो ये है कि उन धमाकों के लिए किसी विशेष ट्रेनिंग की ज़रूरत ही नहीं. इंटरनेट के इस दौर मे बम बनाने के सारे तरीके आसानी से उपलब्ध हैं . विज्ञान से ख़ासकर रसायन विज्ञान से थोड़ा सा भी परिचित आदमी बाज़ार से सामान खरीदकर उनसे बम बना सकता है .अगर बम बनाना आसान है तो फिर कोई भी बना सकता है.
ये कोई ज़रूरी तो नही की केवल मुसलमान ही बम बना सकता है लेकिन इस तरह का माहौल ख़ास कर बनाया जाता है कि धमाकों के पीछे किसी मुसलमान का ही हाथ है और कोई हिंदू संगठन तो ऐसा कर ही नहीं सकता है. ज़ाहिर है ऐसी धारणा के विरोध मे आम मुसलमान भी ये कहने लगता है की ये सारा कुछ मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश है जिसके पीछे सरकारी तंत्र और हिंदू कट्टरपंथी संगठन शामिल हैं. जिस तरह से एक आम हिंदू ये सोच ही नहीं पाता कि कोई हिंदू संगठन भारत मे बम धमाका क्यों कराएगा उसी तरह से एक आम मुसलमान ये तर्क देता है की कोई मुसलमान हैदराबाद की मक्का मस्जिद या मालेगाँव के क़ब्रिस्तान के पास बम धमाके क्यों करेगा. लेकिन सच्चाई तो ये है कि इस तरह की सोच रखने वाले लोग न तो हिंदू होते हैं न मुसलमान . उनके लिए सिर्फ़ ये ज़रूरी होता है की उनका अपना हित पूरा हो रहा है कि नहीं. कुछ समाजशास्त्रियों का तो यहाँ तक कहना है की पाकिस्तान के मस्जिदों मे अगर मुसलमान बम धमाका कर सकता है तो भारत में भी मस्जिदों में मुसलमान बम धमाका कर सकता है और अगर महात्मा गाँधी को मारने वाला एक हिंदू हो सकता है तो भारत मे भी किसी जगह कोई हिंदू बम धमाका कर सकता है. तुष्टिकरण अब सवाल ये है की अगर धमाके हो रहे हैं तो कोई तो इसके लिए ज़िम्मेदार है चाहे वो किसी भी मज़हब का हो और उनको सज़ा दिलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है.
इससे जुड़ी एक और ख़ास बात है कि जिस तरह से कुछ हिंदू ये सोचते हैं की सरकार मुसलमानों का तुष्टिकरण करती है वहीं दूसरी ओर मुसलमानो का एक तबका सरकार पर भेद-भाव बरतने का आरोप लगाता हैं. इसके लिए मुस्लिम बुद्धिजीवी और मुस्लिम उलेमा कुछ तर्क भी देते हैं. इसी संदर्भ मे एक ख़ास मिसाल जो लगभग हर मुसलमान देता है वो है मुंबई मे 1993 का बम धमाका. हम सभी जानते हैं कि बम धमाके में सौ से ज़्यादा लोगों पर मुक़दमा चला और अस्सी से ज़्यादा लोगों को सज़ा भी हुई. लेकिन मुंबई दंगों मे शामिल एक भी आदमी को आजतक सज़ा नही हुई. यहाँ तक की श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट को उस समय के मुख्यमंत्री और शिव सेना के नेता मनोहर जोशी ने हिंदू विरोधी बताते हुए ठुकरा दिया था. आयोग की रिपोर्ट मे दोषी पाए गए पुलिस अधिकारियों में से एक आध पर कार्रवाई हुई लेकिन ज़्यादातर अधिकारियों पर कार्रवाई तो दूर उन्हें पदोन्नति दी गई. मुसलमान समाज ये पूछता है कि अगर बम धमाकों मे शामिल लोगों को सज़ा हो सकती है तो दंगों मे शामिल लोगों को सज़ा क्यों नही. ऐसे मे गुजरात के दंगों की बात करने की ज़रूरत ही नहीं. पुलिस और इंटेलिजेंस के आला अधिकारी मानते हैं की ऐसे हालात में कुछ युवाओं को बहुत आसानी से बहकाया जा सकता है और उनसे इस तरह के धमाके करवाए जा सकते हैं. मीडिया की भूमिका मुसलमान मीडिया से भी कुछ हद तक नाराज़ रहते हैं. मुंबई बम धमाकों में शामिल लोगों को मिली सज़ा को प्रमुखता से कवर करने वाली मीडिया मे से कुछ को छोड़ कर किसी ने भी सरकार से ये नही पूछा की दंगाइयों को सज़ा क्यों नही हुई.
छोटी सी ख़बर को भी ब्रेकिंग न्यूज़ कह कर दिन भर चलाते रहने वाली मीडिया ने अप्रैल 2006 में महाराष्ट्र के नांदेड़ शहर मे बम बनाते समय हादसा हो जाने से एक हिंदूवादी संगठन के दो कार्यकर्ताओं की मौत की ख़बर को बिल्कुल ही नज़रंदाज़ कर दिया. ये ख़बर सिर्फ़ उर्दू अख़बारों मे छपी और उसके बाद कुछ स्थानीय अख़बारों और अंग्रेज़ी अख़बारों मे छपी लेकिन किसी भी टीवी चैनल पर ये ख़बर नही आई . दरअसल हमें ये समझने की ज़रूरत है की इस तरह की कार्रवाइयों का केवल एक ही मकसद होता है - हिंदू मुसलमानों के बीच दंगा करवाना. ये बहुत ही खुशी की बात है की हैदराबाद, वाराणसी, दिल्ली या अब जयपुर की जनता ने माहौल को ख़राब नहीं होने दिया और शांति कायम रखा . लेकिन इसका श्रेय किसी राज्य या केंद्र सरकार को नहीं बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ उनलोगों को जाता है. और यही वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है की ऐसे हादसों के बाद किसी ख़ास समुदाय के ख़िलाफ़ शक करने के बजाए उनके साथ मिलकर इस मुसीबत का मुक़ाबला किया जाए. |
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