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सपनों भर ज़िंदगी को मुट्ठी भर मिट्टी भी नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अनुपम अपनी आख़िरी नींद सो गया है. महज 20 बरस की जिंदगी देखकर सदा के लिए खामोश हो गया मंगलवार को जयपुर में हुए बम धमाकों में. और तीन दिन बाद भी परिवार का कोई व्यक्ति नहीं आ सका उसके शव को लेने, अंतिम संस्कार करने. अनुपम की तरह ही 12 शव अभी भी सवाई मानसिंह अस्पताल के शवगृह में पड़े हुए हैं. इनमें से छह की पहचान हो गई है और छह अभी भी ऐसे हैं जिनकी सुध लेने वाला या पहचानने वाला कोई नहीं है. प्रथमदृष्टया सभी शव ऐसे परिवारों के हैं जो या तो मज़दूर हैं, भीख मांगते हैं या फिर कुछ छोटा-मोटा काम करने वाले हैं. जिन छह शवों की पहचान हुई है उनमें से चार भिखारियों के हैं. ये भिखारी उस मंदिर के पास भीख मांगते थे जहाँ मंगलवार को विस्फोट हुआ. पर पहचान महज़ इतनी है कि ये भिखारी हैं... किसके बाप, भाई या बेटे हैं, इस बारे में पुलिस या प्रशासन के पास कोई मालूमात नहीं है. यानी इन शवों का कोई वारिस नहीं. ये लावारिस से अभी भी शवगृह में पड़े हैं. उससे भी ज़्यादा जितने ये भीख मांगते हुए सड़कों पर होते थे. एक कारीगर है आभूषणों का जिसने अपने हाथों से कितनी ही सुहागिनों के मंगलसूत्र तैयार किए होंगे, कितने ही बच्चों के शगुन तैयार किए होंगे पर सुंदर और अच्छे लगने वाले आभूषणों का हुनरमंद आज शवगृह में सड़ रहा है. उससे बदबू उठने लगी है. मुट्ठी भर मिट्टी मिट्टी के शरीर को मिट्टी में मिलाने में हमलावरों को कुछ चंद मिनट ही लगे पर मिट्टी हो चुके इन शवों को अभी भी मिट्टी नसीब नहीं हो रही है.
लंबे, छरहरे बदन के इंजीनियरिंग के छात्र, अनुपम का शव देखकर तो कलेजा मुँह में आने को होता है. अनुपम बिहार के किसी ज़िले का रहनेवाला है. जयपुर के शंकरा इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ता था. घर-परिवार के लोगों को बड़ी आस थी और उनके साथ कितनों के सपने साकार होने को थे. अनुपम विस्फोट की शाम अपने दोस्तों के साथ बाज़ार में किताबें ख़रीदने आया था. पैसे कम थे इसलिए किताबें तो नहीं ले पाया पर सोचा क्यों न मंदिर में दर्शन करते चलें. दर्शन के लिए बढ़े क़दम उसको ज़िंदगी भर के लिए किताबों, सपनों, अपनों...सबसे दूर लेकर चले गए. तकलीफ़देह यह है कि अनुपम के कॉलेज की ओर से कोई अभी तक उसके शव की सुध लेने नहीं आया है. और न ही परिवार के लोगों से संपर्क करने की कोशिश की है. शवगृह पर मौजूद पुलिसकर्मियों और स्वयंसेवियों ने बताया कि उसके दोस्तों ने बुधवार को वहाँ आकर उसकी पहचान की थी और उसके दिल्ली में रह रहे रिश्तेदारों को ख़बर की थी पर अभी तक कोई उसे लेने नहीं आ सका है. बाकी के छह शव भी पहचान की आस में पड़े हैं. बार-बार कूलिंग रूम के खुलते दरवाज़े, बढ़ते तापमान और देखरेख के सरकारी ढर्रे में शव अब ख़राब होने लगे हैं. इतने कि बड़ी मुश्किल से उनके पास कुछ मिनट ठहर सका. इन शवों में कई लोग शायद राजस्थान या दूसरे राज्यों से आए वो अभागे होंगे जिनके गाँव तक आज भी एक चिट्ठी पहुँचने में 10 दिन लग जाते हैं और पढ़वा पाने में कई घंटे. भिखारी, मज़दूर, कामगार, रिक्शा खींचने वाले.. ऐसे कितने ही ग़रीब, असहाय और गुमनाम हमारी ज़िंदगी की रोज़मर्रा की ज़रूरतों का हिस्सा हैं पर इनका पता पूछने-बताने वाला कोई नहीं है शायद. पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मौके मैंने देखे हैं जहाँ हमलों, दुर्घटनाओं में वो लोग शिकार हुए हैं जिनका सियासत और संपदा से कोई संबंध नहीं है. जो रोज़ जिंदा रहने का संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें मौत भी इतना क्रूर अंजाम देती है. सचमुच ग़रीबी कई बार मौत से भी क्रूर होती है. इन शवों का सच विस्फोट से पहले तक एक हंसती, खेलती और संघर्ष करती ज़िंदगी थी. आज इनका सच मिट्टी है और अभी भी इन्हें मुट्ठी भर मिट्टी नसीब नहीं है. |
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