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शुक्रवार, 16 मई, 2008 को 02:22 GMT तक के समाचार
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यह सब जयपुर में कैसे हो गया, क्यूँ हो गया?

धमाके की अगली सुबह जयपुर
जयपुर सहमा हुआ सा था सन्नाटा पसरा हुआ था

बुधवार को जयपुर में बम धमाकों के बाद के हालात पर रिपोर्ट करते हुए कुछ अजीब सी अनुभूति हो रही थी.

कुछ-कुछ वैसे ही जैसे परिवार में किसी के गुज़र जाने के बाद होती है. कुछ हमारे सामाजिक बंधन और रीति रिवाज़, तो कुछ दूसरों का दुख बाँटने और बुरे समय में साथ खड़े रहने की इच्छा.

अपने साथियों, दोस्तों एवं परिजनों के घर परिवार में किसी की मृत्यु होने पर अस्पताल, श्मशान घाट और घर जाने की परंपरा का निर्वाह हममें से ज़्यादातर लोग करते हैं, लेकिन फिर भी हम सबसे अधिक दुख तभी महसूस करते हैं जब किसी क़रीबी व्यक्ति की मौत हो जाती है.

यह व्यथा उस वक़्त और बढ़ जाती है जब मौत बिना किसी चेतावनी के अचानक आती है.

जयपुर उस दिन अचानक और असमय हुई मौत की पीड़ा का एहसास करा रहा था.

पत्रकारिता

पत्रकारों के लिए विनाश, विध्वंस और आपदा की रिपोर्टिंग कोई नया अनुभव नहीं होता है. समाचार संकलन की दुनिया का मिज़ाज ही कुछ ऐसा है. सूनामी, भूकंप, बाढ़ एवं तूफान के साथ-साथ जंग, मुठभेड़, दंगे और बम विस्फोटों ने पत्रकार कौम को जैसे एक से एक हृदयविदारक कहानी और दृश्य के लिए जैसे तैयार किया हुआ होता है.

हिंसा की शिकार एक बच्ची
पत्रकार आमतौर पर विभिषिकाओं के दर्द से अपने को थोड़ा अलग रख लेते हैं

तमाम अनुभव के बावजूद शायद ही कोई ऐसा पत्रकार होगा जिस पर हिंसक मृत्यु और त्रासदीपूर्ण घटना अपना असर न छोड़ती हो.

पर फिर भी इस तरह की घटनाओं का अनुभव, समय पर समाचार भेजने का दबाव जिसे ‘डेडलाइन प्रेशर’ कहते हैं और एक कहानी और त्रासदी के पूरी तरह ख़त्म होने से पहले ही अगली कहानी और नई सुर्खियों की ओर ध्यान मुड़ जाने के कारण पत्रकार इस तरह की घटनाओं को भी कुछ अलग होकर, तटस्थ और एक प्रोफ़ेशनल प्रेक्षक की वजह से देख पाते हैं. यह नज़रिया उनके दीर्घकालीन मानसिक संतुलन के लिए अच्छा है.

लेकिन जब ख़बर कहीं आपके बहुत निकट से निकली हो तो प्रोफ़ेशनल वैराग्य और तटस्थता बनाए रखना आसान नहीं होता.

मेरा जयपुर

जयपुर बम धमाकों के संदर्भ में कुछ यही हुआ और मेरे अंदर चला एक अजीब सा द्वंद्व. मेरे अंदर के 25 वर्षों के अनुभव वाले पत्रकार को चुनौती मिल रही थी, एक ऐसे शख़्स से जिसका जयपुर घर था, वह वहीं पढ़ा-लिखा और बड़ा हुआ था.

वह व्यक्ति जयपुर पर हुए इस हमले के समय न प्रोफ़ेशनल रहना चाहता था और न तटस्थ.

मैंने जयपुर छोड़ा था 15 वर्ष पहले. सिवाय उस एक वर्ष के जब मैं लंदन में था और जयपुर नहीं आया, ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि मैं महीने में औसतन 2-3 दिन के लिए जयपुर न आया हूँ.

मेरे जीवन की सबसे खुशनुमा ही नहीं सबसे दुखद यादें भी जयपुर से ही जुड़ी हुई हैं.

हर वर्ष लाखों की संख्या में सैलानी जयपुर आते हैं. जयपुर एक अच्छा मेज़बान है. सुसंस्कृत और बेहद सुंदर भी है. इन सबके साथ-साथ जयपुर मेरे लिए घर, परिवार और दोस्त भी है.

हिंसा का शिकार एक व्यक्ति
जयपुर के लोगों को अपने शहर में ऐसे हादसे का कोई अंदेशा ही नहीं होता था

मैं जयपुर का अनौपचारिक राजदूत भी हूँ. जिससे दोस्ती होती है, उन्हें जयपुर भेजने का प्रयास करता हूँ कि वह जयपुर की खूबसूरती और वहाँ की सुस्त रफ्तार और आरामदेह अंदाज़ का लुत्फ़ उठाए. शायद जयपुर के इस प्रमोशन में मैं कुछ लोगों को अति उत्साहित भी नज़र आता हूँ.

कुछ दोस्त जयपुर से मायूस भी लौटते हैं. इनकी संख्या ज़्यादा तो नहीं है पर उनका मानना है कि जयपुर के मामले में मैं कुछ ज़्यादा ही एकतरफ़ा हो जाता हूँ और ऐसी भी कोई नियामत नहीं है जयपुर.

मुझसे नाइत्तफ़ाक़ी रखने वालों को अपनी स्वतंत्र सोच रखने का पूरा अधिकार है. पर मेरी सोच में उससे कोई अंतर नहीं पड़ता.

बम धमाकों का समाचार आते ही मैंने जयपुर में घर वालों, रिश्तेदारों और दोस्तों की ख़ैर-ख़बर लेने के लिए फ़ोन करने शुरू कर दिए.

अलग सी यात्रा

बुधवार तड़के 3.30 बजे बम धमाकों के क़रीब सात घंटे के बाद जब हमारी गाड़ी ने जयपुर में प्रवेश किया तब तक मैं लगभग अपने हर क़रीबी व्यक्ति की खैर-ख़बर ले चुका था और सबकी ख़ैरियत के संदर्भ में आश्वस्त था.

ज़ाहिर सी बात है कि इस पृष्ठभूमि के साथ मैं जब परकोटे के भीतर वाले जयपुर शहर में प्रवेश कर रहा था तो मुझे ऐसा नहीं लग रहा था कि यह यात्रा मेरी कुछ अन्य रिपोर्टिंग यात्राओं से अलग होगी. लेकिन ऐसा सोचते वक्त मैं शायद जयपुर को एक ख़ूबसूरत शहर से ज़्यादा की तरह नहीं देख रहा था. जैसे-जैसे मैंने जयपुर के उन हिस्सों को देखा जो मंगलवार शाम हुए बम धमाकों से क्षतिग्रस्त हुए थे, मेरी मनोस्थिति बदलती गई.

एक निर्जीव पत्थर, ईंट और सीमेंट के शहर के स्थान पर मुझे घायल जयपुर किसी सजीव परिचित की तरह अपने जख़्मों और दर्द में शरीक कर रहा था.

पुरानी यादें भी जैसे एक साथ ताज़ा हो गईं. बचपन में अपने माता-पिता के साथ धनतेरस के त्यौहार पर त्रिपोलिया बाज़ार बर्तन ख़रीदने जाना या फिर होली-दीवाली पर बड़ी चौपड़ पर पूजा सामग्री, पटाखे और गुलाल इत्यादि ख़रीदने पहुँचना. जौहरी बाज़ार में कपड़े ख़रीदने जाना और माँ, पत्नी, बहन या सास जब किसी जौहरी के यहाँ बहुत देर लगातीं या एक के बाद एक साड़ियाँ देखतीं और घंटों लगातीं तो मेरा वहाँ बोरियत में इंतज़ार करना.

 लोगों में कहीं बहुत डर और घबराहट नहीं दिख रही थी. पर सबके चेहरे पर कहीं यह सवाल अवश्य था कि यह सब जयपुर में कैसे हो गया, क्यूँ हो गया

एलएमबी के दही बड़े, रसमलाई, आलू की टिक्की और घेवर. उनको याद करके अब भी मुँह में पानी आ जाता है और नथुनों में भर जाती है इन व्यंजनों की ख़ुशबू.

बड़ी चौपड़ के एक ओर शाही हवा महल तो दूसरी तरफ़ है ख़ूबसूरत जौहरी बाज़ार. गुलाबी पेंट में रंगी लाइन में दुकानें, जिनके शटर आज बंद थे. बड़ी चौपड़ मंगलवार के बम धमाकों का जैसे केंद्र बिंदु थी. सभी विस्फोट बड़ी चौपड़े के इर्द-गिर्द डेढ़ किलोमीटर के दायरे में हुए थे.

कर्फ़्यू की वजह से इतना सन्नाटा था कि जो रास्ता तय करने में और भीड़ में धक्के खाते हुए स्कूटर या कार चलाने में 15-20 मिनट लग जाते थे वह फ़ासला 2-3 मिनट में तय हो रहा था.

जब से मैं बड़ा हुआ इस धक्का-मुक्की और भीड़-भाड़ से पापा को दूर रखने के लिए होली-दीवाली का सामान ख़रीदने के लिए स्वयं अकेले उनके बिना आना प्रारंभ कर दिया था.

आज मैं उस भीड़-भाड़, हंगामे और ट्रैफ़िक की रेल-पेल भर को नहीं याद कर रहा था. मुझे अपने पिताजी की भी याद आ रही थी जिनका पिछले वर्ष निधन हो गया था.

लोगों में कहीं बहुत डर और घबराहट नहीं दिख रही थी. पर सबके चेहरे पर कहीं यह सवाल अवश्य था कि यह सब जयपुर में कैसे हो गया, क्यूँ हो गया.

भारतीयों के लिए आतंकवाद कोई नया या अपरिचित एहसास नहीं है. परन्तु जब तक उसका कहर कहीं नज़दीक नहीं होता, जैसे उसके सच्चे होने पर विश्वास नहीं होता.

मंगलवार शाम आतंकवाद का रूप जयपुर में कहर बनकर बरपा और जयपुर का नाम भी उन शहरों की फ़ेहरिस्त में शामिल हो गया जहाँ आतंक फैलाने वाली कार्रवाइयाँ हो चुकी हैं.

दुआ हम सिर्फ़ यह कर सकते हैं कि अपने जयपुर में दुबारा ऐसा मंज़र देखने और रिपोर्ट करने के लिए आना न पड़े.

जयपुर धमाकेदहशत में गुलाबी नगरी
जयपुर में हुए धमाकों पर बीबीसी हिंदी की विशेष प्रस्तुति.
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