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बुधवार, 14 मई, 2008 को 07:24 GMT तक के समाचार
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अस्पताल में दिल दहला देने वाला मंज़र

अस्पताल में भर्ती घायल
जयपुर में मंगलवार की शाम सिलसिलेवार सात धमाकों में कई लोग घायल हुए हैं
जयपुर कराह रहा है. दर्द से और बेवजह, बिन बताए मिली इस चोट से भी.

गुलाबी शहर की कई सड़कें, चौराहे रक्तरंजित नज़र आ रहे थे. परंपरा, संस्कृति और धरोहरों की धरती चरमपंथी हमलों से दागदार हो गई थी.

जहाँ मंगलवार की शाम को हुए चरमपंथी हमले का खून नहीं बहा था, वहाँ हमलों के बाद का दर्द और मनहूस सन्नाटा पसरा दिख रहा था.

बीच-बीच में पुलिस की तेज़ी से गश्त करती गाड़ियां भी नज़र आ रही थीं.

धमाकों के बाद जब पीड़ितों की स्थिति और मृतकों की तादाद जानने के लिए मैं जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में दाखिल हुआ तो सामने जो सबसे पहली चीज़ थी, वो थी मरनेवालों और घायलों की सूची.

लोग जितना ज़्यादा ध्यान लगाकर अपनों का नाम खोज रहे थे, उससे भी कहीं ज़्यादा दुआ कर रहे थे कि उनके अपने या अपनों का नाम इस लिस्ट में न हो.

वार्डों में बिस्तरों पर घायल लोग पड़े थे. बीच-बीच में उनके मुँह से कराह उठती थी.

इस कराह में कुछ राम-राम कह रहे थे तो कुछ अल्लाह-अल्लाह. धमाके करनेवालों का मजहब क्या था, किसी को नहीं मालूम.

कौन बने निशाना..?

डॉक्टरों के साथ ही मेडिकल के स्टूडेंट भी एक मरीज़ से दूसरे मरीज़ तक भागते नज़र आ रहे थे.

हताहतों की सूची देखते लोग
लोग अपनों की तलाश में वार्ड से लेकर शवगृह तक दौड़ते नज़र आ रहे हैं

बच्चे, स्कूल और कॉलेज जाने वाले, पुजारी, व्यवसायी, मज़दूर.. ऐसी तमाम पहचानों से अलग इन लोगों की एक पहचान रह गई थी और वो थी इन हमलों का शिकार होने की. सबका दर्द एक-सा था.

इस दौरान भारी तादाद में मीडिया और विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार, कैमरामैन भी वहाँ मौजूद थे. घायलों की तकलीफ़ से ज़्यादा अपनी कवरेज पर ध्यान लगाते हुए.

कुछ घायल और मृतकों के परिजनों ने हमारे हाथ में भी माइक देखा और बोल पड़े, हमें माफ़ कीजिए, हम तकलीफ़ में हैं. बस, बहुत हो गया.

सबसे तकलीफ़देह मंज़र था अस्पताल के शवगृह का.

यहाँ एक के बाद एक शव निकाले, पहचाने जा रहे थे. किसी को अपना बेटा नहीं मिल रहा था तो किसी की माँ अभी तक घर नहीं पहुंची थी और परिवार डरा-सहमा लाश दर लाश कफ़न हटाकर पहचान करने की कोशिश कर रहा था.

कंधों पर अपनों का बोझ

एक अपाहिज मृत हमेशा के लिए सो चुका था. एक धड़ था जिसे सिर और पहचान की ज़रूरत थी. एक साधु, जिसकी सफ़ेद सन जैसी दाढ़ी पर ख़ून के क़तरे सूख गए थे.

अस्पताल में भर्ती घायल
इलाज के दौरान अस्पताल में ख़ून तो कम पड़ा लेकिन देने वालों की कमी नहीं रही

रोने की आवाज़ें, ढाढस के हाथ, शवों को ले जाने वाली गाड़ियों की डरावनी परछाई और अपनों का बोझ अपने ही कंधों पर.

हालांकि सुबह लोगों की एक तादाद रात की इस घटना के बाकी बचे निशानों को दिन की रोशनी में देखने के लिए फिर से घटनास्थलों की तरफ आई थी पर पुलिस ने सुबह से ही लोगों को इकट्ठा होने नहीं दिया. शहर में कर्फ्यू घोषित कर दिया गया है.

पर इस पूरे दर्द, असमंजस और पीड़ा के बीच एक सवाल का जवाब न तो प्रशासन के पास है और न ही लोगों को समझ में आ रहा है. बस इतना भर कि कौन है इस वहशीयाना हमले के पीछे. किसके हित छिपे हैं इसमें और क्या होगा इस शहर की गंगाजमुनी तहज़ीब का.

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