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'नए रास्ते तलाश करने होंगे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जयपुर में हुए इन सिलसिलेवार धमाकों से यह बात साबित होती है कि चरमपंथी संगठनों का जाल अब भी कायम हैं और हम इन्हें तोड़ने में बहुत सफल नहीं हुए हैं. दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है, वह यह है कि ये चरमपंथी संगठन कोई धार्मिक दिन ही हमले के लिए चुनते हैं. इससे पहले मुबंई, हैदराबाद और वाराणसी में भी हमने यह देखा है. इनका मकसद भारत में जो सांप्रदायिक सौहार्द है उसे छिन्न-भिन्न करना है. पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान में काफ़ी बदलाव हुआ है. वहाँ जो नई सरकार बनी है वह अभी पाकिस्तान में मौजूद कट्टरपंथी ताक़तों पर अपना प्रभाव नहीं जमा पाई है. जब तक पाकिस्तान इन चरमपंथी नेटवर्क को तोड़ने में भारत की मदद नहीं करता तब तक भारत और पाकिस्तान दोनों को इससे तक़लीफ़ होगी और कई निर्दोषों की इन हमलों में जान जाएगी. जयपुर में हुए ये सिलसिलेवार धमाके मेरी समझ से एक बड़ी साजिश का नतीजा है. भीड़ भरे इलाक़े में हुए विस्फोट से कई निर्दोषों की जान गई और कई लोग घायल हुए हैं. चूँकि इन हमलों में बाहरी ताक़तें शामिल हैं, इस वजह से देश की खुफ़िया एजेंसियों को जाँच करने में काफ़ी मुश्किलें होती हैं. निस्संदेह इन्हें देश के अंदर मौजूद विघटनकारी ताक़तों का भी सहयोग होगा. अंतराष्ट्रीय आतंकवाद का रुप हमारे सामने मुसीबत बनके खड़ा है. हमें अपनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए इन चरमपंथियों से लड़ने के लिए नए रास्ते, नए तरीके ढूँढने होंगे. सबसे बड़ी समस्या ये है कि हमारी स्थानीय सुरक्षा एजेंसियाँ हैं वे बहुत ताक़तवर नहीं हैं. (सचिन गौड़ से बातचीत पर आधारित) |
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