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भुखमरी की वजह से जा रही हैं जानें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में जटाई का परिवार भुखमरी की वजह से एक-एक कर अपने पाँच सदस्यों को खो चुका है. ये सारी मौतें पिछले डेढ़ साल में हुई हैं. यहाँ के घूरपट्टी गांव की जटाई कहती हैं, "हमारे पास खाने को कुछ नहीं है. न हमारे पास ज़मीन है और न ही हमें कोई काम मिलता है. हमने पिछले सात-आठ दिनों से कुछ भी नहीं खाया है और मेरे पति तो भूख से तड़प-तड़प कर मर गए. उनके पास कोई काम नहीं था." कुछ यही हाल इसी ज़िले के बेनवलियां गांव का है. 2006 के अगस्त महीने में 19 साल के श्रीनिवास मुसहर की मौत खाना नहीं मिलने से हुई. श्रीनिवास के पड़ोसी बताते हैं कि उसने पिछले 20 दिनों से कुछ नहीं खाया था. कांति का झोपड़ा श्रीनिवास की मां कांति ज़िंदा तो है लेकिन, उसकी सेहत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मुझसे बात करने के लिए वो बड़ी मुश्किल से खड़ी हो पा रही थी. उसका शरीर काँप रहा था. कांति ने मुझे अपने टूटे-फूटे झोपड़े के अंदर ले जाकर दिखाया उसका परिवार आज क्या खाने वाला है. कांति अपने पड़ोसियों से दो मुट्ठी चावल मांग कर लाई है. जिन्हें वो और उनके दो बच्चे खाएंगे. कांति के झोपड़े के बाहर तो सूरज की रोशनी है लेकिन झोपड़े के अंदर अंधेरा ही अंधेरा है. अपने झोपड़े की छत पर से छन-छन कर आती हुई धूप की ओर इशारा करते हुए कांति बताती है, "बारिश के दिनों में इसी जगह से पानी टपकता है." कांति के इस झोपड़े के अंदर एक किनारे पर एक चारपाई रखी है जिस पर उसके दोनों बच्चे सोते हैं. कांति ने अपना बिस्तर भी दिखाया जो वो ज़मीन पर बिछा कर सोती है. ये एक पतली सी गोदड़ी है. कांति के शरीर पर जैसे मांस बचा ही नहीं. उसकी पसलियां साफ़ नज़र आती हैं. उसके पड़ोसी कहते हैं वो मर रही है. उसे टीबी है. जब मैंने कांति से इस बारे में बात की तो वो बोली, "मेरे पास डॉक्टर की फ़ीस और दवा ख़रीदने के पैसे नहीं हैं." भुखमरी से मौतें कुशीनगर के इलाके में काम करने वाली एक ग़ैर सरकारी संस्था के मुताबिक 2003 से 2006 के बीच भुखमरी से यहां 52 लोगों की मौत हो चुकी है. लेकिन अधिकारी इस बात से साफ़ इनकार करते हैं. श्रीनिवास मुसहर की मौत पर राज्य सरकार के अधिकारियों का कहना है कि उसकी मौत बीमारी की वजह से हुई थी. राज्य के आला अधिकारी शैलेष कृष्ण कहते हैं, "पूरे राज्य में कहीं भुखमरी नहीं है. हां, कुछ इलाकों में कुपोषण के मामले ज़रूर पाए गए हैं. लेकिन ये तो पूरे देश में हैं. कुपोषण की वजह से ही लोगों में बीमारियों से लड़ने की ताक़त ख़त्म हो जाती है."
शैलेष मानते हैं कि कुशीनगर में ग़रीबी तो है लेकिन वो कहते हैं, "इसे एक दिन में तो ख़त्म नहीं किया जा सकता." भुखमरी से निपटने के सरकारी दावों पर बहुत कम ही लोग यकीन कर पाते हैं. मानवाधिकार संगठन के मनोज कुमार सिंह कहते हैं, "कैसे कोई सत्ता पर क़ाबिज़ पार्टी भुखमरी से इनकार कर सकती है. जब वो विपक्ष में होते हैं तो उन्हें भूख से मर रहे लोग नज़र आते हैं. लेकिन सत्ता में आते ही जैसे सब-कुछ ठीक हो जाता है." यहां के पिछड़ेपन का अंदाज़ा आप कुशीनगर की सड़कों से ही लगा सकते हैं. आलम ये है कि ज़िले के गोरखपुर से महज़ 58 किलोमीटर दूर होने के बाद भी यहां तक पहुंचने के लिए आपको ढाई घंटे लग जाएंगे. चूहे खाने को मजबूर कुशीनगर आकर आपको मालूम होगा कि विकास और तरक्क़ी की हवा यहाँ तक कितनी पहुँची है. सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम यहाँ ज़रा भी दिखाई नहीं पड़ता. कई परिवारों में सिर्फ़ बच्चे ही बच्चे नज़र आते हैं. जबकि, पूछने पर मालूम चला कि उनके कई बच्चों की मौत भुखमरी, कुपोषण और दूसरी बीमारियों की वजह से हो चुकी है.
इस इलाक़े में एक समुदाय रहता है जिसे लोग 'मुसहर' कहते हैं. जैसा की नाम से ही ज़ाहिर है कि ये समुदाय चूहों का शिकार करता है और उन्हें खाता है. इस समुदाय की आबादी यहाँ तक़रीबन 1 लाख के आस-पास होगी. ग़रीबी और भुखमरी का आलम ये है कि ज़्यादातर लोगों के पास काम ही नहीं है. ये तमाम लोग दलित समुदाय में आते हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता मनोज सिंह का कहना है इस इलाक़े में ग़रीबी की एक मुख्य वजह खेती के तरीक़े में आया बदलाव है. "पहले यहां खेती का पारंपरिक तरीक़ा इस्तेमाल किया जाता था. जिससे लोगों को खेतों में मज़दूरी मिल जाया करती थी. लेकिन, आधुनिक उपकरण आ जाने से इनकी मांग न के बराबर हो गई है." भ्रष्टाचार और शोषण इस समुदाय के ज़्यादातर लोग अनपढ़ हैं. लोगों में जागरूकता नहीं है. बीमारियाँ लोगों को घेरे हुई हैं और सरकार लगातार इनकी अनदेखी कर रही है. केंद्र की यूपीए सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना भी यहाँ नाक़ामयाब दिखाई देती है. इस योजना के तहत सरकार ने क़ानून बना दिया है जहाँ यह योजना लागू है वहाँ हर परिवार के एक सदस्य को साल में 100 रुपए की दर से 100 दिन काम मिलेगा. लेकिन, गाँव के लोगों ने बताया कि वो काम के लिए कोशिश कर-कर के हार चुके हैं. जिन लोगों को इस योजना के तहत रजिस्टर किया गया था उनमें से ज़्यादातर को काम नहीं दिया गया और जिन्हें काम मिला उन्हें तय मज़दूरी नहीं मिली. भ्रष्टाचार और शोषण का हाल ये है कि मज़दूरों को एक दिन जमकर पसीना बहाने के बाद भी 50 से 80 रुपए ही मिल पाते हैं. कई बार तो दलाल इससे भी कम पैसे देते हैं. ग़रीबी की तस्वीर ग़रीबी और भुखमरी की एक और ऐसी ही तस्वीर देखने को मिली तारकुलवां गाँव में.
यहां पहले ही आठ बच्चों की माँ आसिया ने अपने नौंवे बच्चे को महज़ 200 रुपए में एक परिवार को बेच दिया. हालांकि, आसिया इससे इनकार करती है कि उसने अपनी लड़की को बेचा है. पूछने पर आसिया कहती है, "उस महिला को कोई औलाद नहीं थी और उसने तो मुझे दो सौ रुपए मदद के लिए दिए थे." आसिया के परिवार के पास कोई ज़मीन नहीं है. उसका शौहर वैसे तो खेतीहर मज़दूर है. लेकिन काम नहीं मिलने पर कोई भी काम कर लेता है. जिससे उसे 50 रुपए दिन के मिल जाते हैं. आसिया खुद भी मज़दूरी करती है. उसे एक दिन की मज़दूरी मिलती है सिर्फ 20 रुपए. आसिया कहती है, "इतने पैसों में हमारा घर नहीं चल पाता. कभी-कभी तो हमें सिर्फ़ नमक और चावल पर ही गुज़ारा करना पड़ता है. कई बार हमें काम नहीं मिलता. हम कुछ बचा भी नहीं पाते. हम एक दिन की छुट्टी की भी नहीं सोच सकते. बीमार होने की हालत में भी मजबूरन हमें काम करना पड़ता है." इस सब के बावजूद राज्य सरकार अपनी आंखें मूँदे हुए है और भुखमरी और कुपोषण से लगातार मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है. |
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