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कुपोषण से बच्चों की बढ़ती मौत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के महाराष्ट्र राज्य में पिछले साल आदिवासी इलाक़ों में कुपोषण की वजह से छह साल से कम उम्र के क़रीब नौ हज़ार बच्चों की मौत हो गई. चिंता की बात ये है कि औसतन क़रीब 500 बच्चों की मौत हर महीने कुपोषण की वजह से हो रही है. महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि इन मौतों को सिर्फ़ कुपोषण की वजह से ही नहीं कहा जा सकता क्योंकि बहुत से बच्चों की मौत बीमारियों की वजह से भी हो रही है. आँकड़ों के अनुसार राज्य के 15 आदिवासी ज़िलों में इस साल केवल अप्रैल और मई में क़रीब 1000 बच्चों की मौत हो गई. इन सभी बच्चों की उम्र छह साल से कम थी. बेरोज़गारी महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 12 महीनों में 8500 बच्चों की मौत हुई. महाराष्ट्र के आदिवासी इलाक़े देश के बहुत ही पिछड़े हुए इलाक़ों में से हैं जहाँ बेरोज़गारी और कुपोषण एक आम बात है. कुपोषण से हो रही इन मौतों पर ज़्यादा चिंता इसलिए भी हो रही है क्योंकि आदिवासी इलाक़ों में छह साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या क़रीब आठ लाख है. महाराष्ट्र के स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक डॉक्टर सुभाष सालुंखे ने कहा कि कुपोषण इन मौतों में एक मुख्य वजह ज़रूर रहा है लेकिन सिर्फ़ यही एक वजह नहीं था और इन मौतों के कुछ अन्य कारण भी रहे हैं. लेकिन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कुपोषण ही इन मौतों के लिए ज़िम्मेदार है. स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि समुचित भोजन नहीं मिलने की वजह से कुपोषण के शिकार बच्चे बीमारियों से नहीं लड़ पाते. ऐसे ही एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता डॉक्टर अमर जेस्सानी का कहना था कि सरकार कुपोषण को इन मौतों की वजह इसलिए स्वीकार नहीं कर रही है क्योंकि इससे यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा. अब राज्य सरकार ने आदिवासी इलाक़ों में कुपोषण से होने वाली मौतों को रोकने के लिए 130 सचल क्लीनिक बनाए हैं और 20 एम्बुलेंस भी भेजी हैं. |
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