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शनिवार, 27 मार्च, 2004 को 05:16 GMT तक के समाचार
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मुंबई में रिहाई को लेकर नाराज़गी
कंप्यूटर पर अश्लील तस्वीरें
स्विस दंपति के कंप्यूटर पर बच्चों की अश्लील तस्वीरें मिली थीं
मुंबई में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बाल यौन शोषण के मामले में सज़ा काट रहे दो लोगों की रिहाई के अदालत के फ़ैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

ये दोनों स्विट्ज़रलैंड के नागरिक हैं और इन्होंने यौन शोषण का शिकार हुए बच्चों के माँ-बाप को मुआवज़े की रक़म दी थी.

मुंबई में बाल यौन शोषण के अपराध में पति-पत्नी विलहेम मार्टी और लिली मार्टी को सात वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गई थी और अभी उनकी सज़ा की आधी मियाद ही पूरी हुई थी.

मुंबई हाइकोर्ट के जज ने अपने फ़ैसले में कहा कि उन्हें जेल में अधिक दिनों तक रखने से कोई मक़सद पूरा नहीं होगा.

मुंबई में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह इस फ़ैसले पर फिर से विचार करे.

इस स्विस दंपती ने पीड़ित बच्चों के परिवारवालों को छह लाख रूपए मुआवज़े के तौर पर दिए हैं लेकिन इन लोगों को अभी जेल से रिहा नहीं किया गया है.

इन लोगों को दिसंबर 2000 में मुंबई में बच्चों को फुसलाकर अपने होटल के कमरे में ले जाने के बाद गिरफ़्तार किया गया था.

पुलिस को उनके पास बच्चों की अश्लील तस्वीरें मिली थीं और उनके कंप्यूटर में भी ऐसी ही सामग्रियाँ थीं.

इन दोनों व्यक्तियों पर श्रीलंका और थाइलैंड में भी बच्चों का यौन शोषण करने का आरोप था.

दलील

मार्टी दंपति का कहना था कि वे पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने के लिए तैयार हैं और इसके बदले में उन्हें जल्द रिहा कर दिया जाए, उनकी इस अपील को अदालत ने स्वीकार कर लिया.

 हमें इस समाचार से सदमा पहुँचा है, ये लोग रंगे हाथ पकड़े गए थे, उन्हें सज़ा हुई और अब सज़ा पूरी किए बिना उनकी रिहाई हो रही है
एक सामाजिक कार्यकर्ता

अदालत के इस फ़ैसले पर सामाजिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है, बाल यौन शोषण के ख़िलाफ़ संगठन चलाने वाली निगमा मैस्करहैंस ने कहा, "हमें इस समाचार से सदमा पहुँचा है, ये लोग रंगे हाथ पकड़े गए थे, उन्हें सज़ा हुई और अब सज़ा पूरी किए बिना उनकी रिहाई हो रही है."

निगमा का संगठन क़ानूनी विशेषज्ञों से बातचीत कर रहा है और जल्दी ही फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने की तैयारी में है.

सड़क पर रहने वाले बच्चों की मदद करने वाले संगठन साथी के एक सदस्य मंसूर कादरी ने कहा, "यह ग़लत है, ऐसा नहीं होना चाहिए, अदालत ने जो कारण बताए हैं वे ठीक नहीं हैं."

क़ादरी का कहना है कि मामले पर अदालत को फिर से विचार करना होगा वर्ना वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएँगे.

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