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'ग़लत नीतियों की वजह से बढ़ रही भुखमरी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले 15 सालों में हमने जो कृषि और किसान विरोधी आर्थिक नीति को बढ़ावा दिया है उससे कालाहांडी में भुखमरी जैसे समस्याएं देश में बढ़ रही हैं. कालाहांडी में ही क्यों हिंदुस्तान के सबसे संपन्न शहर मुंबई से 90 किलोमीटर दूर थाणे में हर साल कई बच्चे मर जाते है. अमीर और ग़रीब के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है. भुखमरी आज नीतिगत और ढाँचागत विसंगतियों से पैदा हुई समस्या है. प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन अनाज उपलब्धता काफ़ी कम हो गई है. वर्ष 1951 में यह 510 ग्राम थी और वर्ष 2005 में घटकर यह 436 ग्राम रह गई है. ज़ाहिर है आज प्रतिव्यक्ति के लिए पहले के मुक़ाबले 74 ग्राम कम अनाज उपलब्ध है. अगर इसे पूरे परिवार के स्तर पर देखें तो पिछले आठ-नौ साल के मुक़ाबले में आज एक औसत परिवार क़रीब 100 किलोग्राम कम खा रहा है. रोज़गार ज़रूरी इधर अनाज उपलब्धता गिर रही है और हम योजनाओं की भरमार लगाते जा रहे हैं. जब अनाज होगा ही नहीं तो आप बाँटेगे क्या? सरकारी योजनाओं में केवल राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना ही प्रभावी है लेकिन इसके लिए पर्याप्त बजट की व्यवस्था नहीं की गई है. इस बार इसके दायरे को 100 ज़िलों से बढ़ाकर 200 ज़िले कर दिया गया लेकिन बजट में 40 फ़ीसदी से भी कम की वृद्धि की गई. इस योजना से हम भुखमरी और बेरोज़गारी, दोनों पर कुछ हद तक क़ाबू पा सकते हैं पर ऐसा हो, इसके लिए पर्याप्त बजट चाहिए. देश पिछले 40 वर्षों से सबसे बड़े कृषि संकट के दौर से गुज़र रहा है. ऐसा एक संकट हरित क्रांति के समय में था. इससे गांवों के प्रभावित लोग शहरों का रुख़ कर रहे हैं. वहाँ भी स्थिति अच्छी नहीं है. नीतिगत विसंगतियाँ पहले गाँव से लोग शहर आते थे तो उन्हें फैक्ट्रियों, मिलों और इंजनीयरिंग कंपनियों में नौकरी मिल जाती थी लेकिन अब ये बंद हो चुके है. गाँवों से आने वाले लोग अब शहरों में घरेलू नौकर बनने के लिए बाध्य हैं. केवल दिल्ली में झारखंड की क़रीब दो लाख लड़कियाँ घरों में नौकरों का काम कर रही है. हमारे पास इन युवा लोगों के लिए कोई नीति नहीं है. हमने विकास का मॉडल बदल दिया है. पहले हम ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जितना निवेश करते थे आज उससे 30 हज़ार करोड़ कम कर रहे हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों की आय में एक लाख करोड़ की कमी आई है. इसके अलावा हमने कृषि क्षेत्र को विकेंद्रीकृत करके बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ करा दी है इससे खेती करना महँगा हो गया है. वर्ष 1951 में विदर्भ में एक एकड़ ज़मीन पर कपास की खेती के लिए डेढ़ हज़ार रुपए खर्च होते थे आज इसके लिए 10 हज़ार रुपए चाहिए. हमने अपनी ऋण नीति भी बदल दी है. शहरों में रहने वाले लोगों को घर और मर्सिडीज़ के लिए 7-8 प्रतिशत ब्याज पर कर्ज़ मिलता है जबकि किसानों को ट्रैक्टर के लिए महँगा कर्ज़ मिलता है. (बीबासी संवाददाता अविनाश दत्त से बातचीत पर आधारित) |
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