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मंगलवार, 12 जून, 2007 को 12:00 GMT तक के समाचार
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चाय बागानों के बेहाल बेबस मज़दूर

कई मज़दूर भूख और बीमारी से जूझ रहे हैं
"कभी इस बागान की हरी पत्तियाँ सोना उगलती थीं लेकिन इनके सूखने के साथ ही हमारी ज़िंदगियाँ भी सूखने लगी हैं. मेरी पाँच पुश्तें यही काम करते-करते खप गईं लेकिन अब लगता है कि बेरोज़गारी और भूख के कारण मेरी भी जान चली जाएगी."

यह कहते हुए सुखिया उराँव की आँखें भर आती हैं.

उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले में रहीमाबाद चाय बागान दो साल से बंद है, यहाँ काम करने वाले सुखिया का परिवार भरपेट भोजन और साफ पानी के लिए मोहताज है. जीवन की बाकी सुविधाओं की कौन कहे.

 भूखे पेट रहने के कारण छोटी-मोटी बीमारियाँ भी जानलेवा बन जाती हैं
मोतीलाल मुंडा, चाय मज़दूर

कभी पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले चाय उद्योग में बीते कुछ वर्षों से मंदी और तालाबंदी का जो दौर शुरू हुआ है उसने इन बागानों के मजदूरों को असमय ही लीलना शुरू कर दिया है.

राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग और एक गैर-सरकारी संगठन की ओर से कराए गए एक सर्वेक्षण में इस बात का पता चला है कि इलाक़े में अरसे से बंद 14 चाय बागानों में पिछले साल पहली जनवरी से इस साल 31 मार्च यानी 15 महीनों के दौरान 571 मज़दूरों की मौत हो गई है.

राज्य सरकार इन मौतों की वजह तरह-तरह की बीमारियों को बताती है जबकि ग़ैर सरकारी संगठनों का कहना है कि इन मौतों की असली वजह भूख और कुपोषण है.

बंद बागान

राज्य के उत्तरी इलाके में तीन सौ से ज्यादा चाय बागान हैं. इनमें से सौ की हालत बेहद खराब है. 14 बागान तो अरसे से बंद हैं. इन बंद बागानों के मजदूर कितनी बदहाली में जीवन बिता रहे हैं, बागानों में गए बिना इसका अनुमान लगाना संभव नहीं है.

भूख और बीमारी से कई बच्चों की मौत भी हुई है

दो महीने पहले राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी ने भी इलाक़े के बंद रामझोड़ा बागान का दौरा करने के बाद मजदूरों की हालत पर भारी चिंता जताई थी और राज्य सरकार से इस दिशा में समुचित क़दम उठाने को कहा था.

इन बागानों में राशन तो बंद ही है, पीने का साफ़ पानी नहीं है. स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, लेकिन न तो दवाएं हैं और न ही डॉक्टर. बीमारी की हालत में नज़दीक के अस्पताल तक जाने के लिए कोई एंबुलेंस तक नहीं है.

रायमटांग चाय बागान का मोती लाल मुंडा कहता है कि "भूखे पेट रहने के कारण छोटी-मोटी बीमारियाँ भी जानलेवा बन जाती हैं."

कुपोषण और भुखमरी

सर्वेक्षण के मुताबिक़ मृतकों में 10 साल के कम उम्र के 46 बच्चे भी शामिल हैं. गै़र सरकारी संगठनों का मानना है कि उनकी मौत कुपोषण से हुई है लेकिन राज्य सरकार ऐसा नहीं मानती.

मज़दूरों को खाना, पानी और चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध नहीं है

राज्य के उद्योग सचिव सब्यसाची सेन मानते हैं कि इन मौतों की सबसे बड़ी वजह ग़रीबी है. अकेले कालचीनी चाय बागान में ही सबसे ज्यादा 68 लोग मारे गए हैं.

कालचीनी के आरएसपी विधायक और राज्य के लोक निर्माण राज्य मंत्री मनोहर तिर्की भी मौजूदा परिस्थिति के लिए राज्य सरकार की उदासीनता को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं कि "सरकार ने बंद बागानों को खुलवाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है."

कठालगुड़ी चाय बागान के मजदूर नेता माधव उरांव भी यही आरोप लगाते हैं.

अब ऑल इंडिया लीगल एड फ़ोरम ने मज़दूरों की बदहाली के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करने के लिए इलाक़े में अभियान शुरू किया है. इसके तहत जगह-जगह ‘बागान बचाओ, मजदूर बचाओ’ के पोस्टर लगाए गए हैं.

स्टेट लीगल एड फोरम के अध्यक्ष और कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एके चक्रवर्ती की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने बीते सप्ताह बंद बागानों का दौरा किया है. चक्रवर्ती कहते हैं कि "हर बंद बागान में हर सप्ताह दो-तीन मजदूर भूख और बीमारियों से दम तोड़ रहे हैं. इसके लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है."

वे फिलहाल एक रिपोर्ट बना रहे हैं जिसे दो सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट को भेजा जाएगा. चक्रवर्ती बागानों की मौजूदा परिस्थिति के लिए बागान मालिकों को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.

 हर बंद बागान में हर सप्ताह दो-तीन मजदूर भूख और बीमारियों से दम तोड़ रहे हैं. इसके लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है
एके चक्रवर्ती, पूर्व न्यायाधीश

इंडियन टी एसोसिएशन के प्रमुख सलाहकार एनके बसु कहते हैं कि "चाय की क़ीमतों में गिरावट और उत्पादन लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी ही बागानों के बंद होने की प्रमुख वजह है. कई बागान मालिक तो बागान छोड़ कर भाग गए हैं."

मजदूरों की भविष्य निधि और दूसरे मद में बागानों पर तीन सौ करोड़ रूपए से भी ज्यादा रक़म बाकी है. बसु कहते हैं कि "ज्यादातर बागानों के खिलाफ हाईकोर्ट में मामले लंबित हैं. कुछ मामलों में तो बकाया रकम बागान की कीमत से दोगुनी तक पहुँच गई है."

जलपाईगुड़ी जिले के बंद बागानों में लगभग 30 हज़ार मज़दूर बेरोज़गार हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2003 से अब तक इन बागानों में मरने वालों की तादाद 3000 पार कर चुकी है.

लेकिन सरकार और बागान मालिकों के रुख को ध्यान में रखते हुए इन बागानों में चाय के पत्तों की हरियाली लौटने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती.

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