|
चाय के प्याले में आया तूफ़ान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय रेल की चाय के प्याले में इन दिनों तूफ़ान आया हुआ है, रेलवे स्टेशन से लेकर रेल भवन तक हर जगह इसकी गूंज सुनाई दे रही है. रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने प्लास्टिक की जगह मिट्टी के कुल्हड़ में चाय, कॉफ़ी बेचने का आदेश जारी करके चुस्कियों के साथ बहस का मुद्दा भी दे दिया है. रेल अधिकारी कुल्हड़ के बारे में आंकड़े जुटा रहे हैं तो रेलवे के खान-पान ठेकेदार कुल्हड़ की तलाश में भटक रहे हैं. टी-बैग को कुल्हड़ में 'डिप-डिप' करके पीते हुए लोगों को देखना अपने-आप में एक नया और रोचक अनुभव है. गोरखपुर से दिल्ली आए राजीव गुप्ता को 'चाय में घुली राजनीति का फ्लेवर' मिल रहा है. वे कहते हैं, "ये तो रिवर्स गियर में जाने वाली बात हुई, कुल्हड़ में चाय जल्दी ठंडी पड़ जाती है, वैसे ही यह मामला ठंडा पड़ जाएगा. मंत्री जी असली मुद्दों से ध्यान भटका रहे हैं." कुल्हड़ को लेकर हो रहे इस हुल्लड़ में ऐसा नहीं कि हर कोई इसके ख़िलाफ़ हो, भटिंडा से आए सुखबीर सिंह कहते हैं, "चाय का स्वाद चाहे जैसा भी हो, इससे ग़रीब तबके के लोगों को रोज़गार मिलेगा और उनकी माली हालत सुधरेगी." वैसे भी, सुराही और घड़े जब से बीते ज़माने की चीज़ हुए हैं, कुम्हारों के पास दीवाली के दीए बनाने के अलावा ज़्यादा काम नहीं होता. दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हर प्लेटफॉर्म पर हर रोज़ लगभग एक हज़ार कप चाय की बिक्री होती है यानी कुल मिलाकर लगभग तेरह हज़ार. कमी नया फ़ैसला लागू तो हो गया है, लेकिन हर रोज़ हज़ारों-हज़ार कुल्हड़ कहाँ से आएँगे, अब भी प्लास्टिक के कप इस्तेमाल हो रहे हैं क्योंकि कुल्हड़ों की कमी है.
चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाने वाले देवकरण कहते हैं कि उनका परिवार मिल जुलकर भी देर रात तक 400 तक कुल्हड़ बना पाता है. देवकरण कहते हैं, "अगर काम लगातार बढ़ता रहा तो हम गाँव से रिश्तेदारों को बुला लेंगे." लेकिन देवकरण की एक शिकायत भी है, वे कहते हैं कि उन्हें पूरा मेहनताना नहीं मिल पाता क्योंकि कुल्हड़ अब भी बहुत सस्ते बिकते हैं. शिकायत तो रेलगाड़ी में 'चाय गरम चाय' की हाँक लगाकर ग्राहकों की थकान उतारने वालों की भी है, प्लास्टिक के पचासों गिलास बगल में दबाए वे एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में पहुँच जाते थे लेकिन अब... एक चाय बेचने वाले ने बताया, "कुल्हड़ भारी हैं, बार-बार नीचे से लेकर आना पड़ता है, टूट-फूट अलग होती है. कागज़ का कप दस पैसे का एक मिलता था, कुल्हड़ पचास पैसे में आता है." इन समस्याओं और चाय की क़ीमतें बढ़ने की आशंका के बारे में पूछे जाने पर उत्तरी रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी देवेंद्र पाल सिंह संधू कहते हैं, "गाड़ियों में कुल्हड़ रखने की विशेष व्यवस्था की जा रही है, मुझे नहीं लगता कि इससे क़ीमतें बढ़ेंगी." दलील रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कुल्हड़ में चाय बेचे जाने के महत्व पर बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में कहा था, "मिट्टी का शरीर जैसे मिट्टी में मिल जाता है, वैसे ही कुल्हड़ भी मिट्टी में मिल जाएगा."
उनका मानना है कि प्लास्टिक का कचरा अपने-आप में बहुत बड़ी समस्या है जबकि मिट्टी के कुल्हड़ पर्यावरण के लिए भी बेहतर हैं. जिन लोगों को रेल मंत्री की यह दलील पसंद नहीं आ रही है उनका कहना है कि प्लेटफॉर्म पर टूटे हुए कुल्हड़ भी उतने ही ख़राब दिखेंगे जितने कि प्लास्टिक के कप. दूसरी दलील ये है कि काग़ज़ के कपों की रिसाइकिलिंग हो सकती है यानी उनका दोबारा इस्तेमाल भी तो किया जा सकता है. रेल मंत्री ने ये भी कहा है कि कई रेलगाड़ियों में स्लीपर में मिलने वाली चादरें और कंबलें भी खादी की होनी चाहिए. कुछ लोग इस पूरे कुल्हड़ प्रकरण के बहाने सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस तरह की घोषणाएँ रेलवे को पटरी पर लाने के लिए काफ़ी हैं? |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||