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चाय बागानों के मज़दूर बेहाल
कभी कहा जाता था कि पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में तीन 'टी' से राज्य की अर्थव्यवस्था चलती थी. पहला टी- टी यानी चाय और दूसरा टी- टूरिज़्म यानी पर्यटन और तीसरा टी- टिम्बर यानी लकड़ी. लेकिन पिछले वर्षों में परिस्थितियाँ काफ़ी बदल गई हैं. ख़ासकर चाय बागानों की परिस्थितियाँ तो बहुत बदल गई हैं. 6 नवंबर को हुई हिंसक घटना ने इस समस्या को उभार दिया है. पश्चिम बंगाल के चाय बागान कभी हज़ारों मज़दूरों को रोज़गार उपलब्ध कराने वाले रक्षक हुआ करते थे लेकिन अब वे मज़दूरों के दुश्मन बनते जा रहे हैं. एक ओर तो घाटा का रोना रोकर चाय बागानों के मालिक बागानों को बंद करते जा रहे हैं दूसरी और मज़दूरों को कोई वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध नहीं है. नतीजा यह है कि मज़दूर भुखमरी के कगार पर हैं. राज्य के डुआर्स इलाक़े में 19 चाय बागान बंद पड़े हैं. अव्यवहारिक क़दम सरकार ने इसे खुलवाने के लिए त्रिपक्षीय बैठकें बुलवाईं लेकिन उनमें कोई नतीजा नहीं निकला. इस इलाक़े में बड़े छोटे कोई 600 चाय बागान हैं और इनमें से ज़्यादातर में बदहाली है. राज्य सरकार ने कई बार अव्यावहारिक क़दम भी उठाए हैं. उदाहरण के तौर पर सिलीगुड़ी के पास चांदमनी चाय बागान की आधी से ज़्यादा ज़मीन पर सरकार ने साझा क्षेत्र में एक सेटेलाइट टाउन बनाने का फ़ैसला कर लिया. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में पुलिस फ़ायरिंग भी हुई और उसमें दो लोग मारे गए. सरकार ने आश्वासन दिया था कि बागान के कम से कम डेढ़ सौ एकड़ में चाय लगाया जाएगा लेकिन सिर्फ़ पचास एकड़ में चाय लगाया गया. घाटे का सौदा? चाय बागान के मालिकों के संगठन कंसल्टेटिव कमेटी ऑफ़ प्लांटर्स एसोसिएशन के महासचिव एन के बसु का कहना है, ''जिस चाय पर 60 रुपए प्रतिकिलो की उत्पादन लागत आती है वह 45 रुपए की दर से बिक रही है.'' उनका कहना है कि बागान मालिक किसी तरह से बागान चला रहे हैं. केंद्र सरकार ने हाल ही में फ़र्गुसन नाम की एक संस्था से चाय बागानों की स्थिति का अध्ययन कराया था.
दिल्ली की एक संस्था सेंटर फ़ॉर एजूकेशन एँड कम्यूनिकेशन (सीईसी) ने चाय बागानों में मज़दूरों की स्थिति पर एक अध्ययन किया था. संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2002 से फ़रवरी 2003 के बीच भुखमरी और बीमारियों के चलते 240 मज़दूरों की मौत हो चुकी है. सीईसी इस रिपोर्ट के आधार पर मानवाधिकार आयोग का दरवाज़ा भी खटखटाने जा रही है. अलीपुरद्वार के आरएसपी के विधायक निर्मल दास कहते हैं, ''सरकार ने बंद बागानों के मज़दूरों को पाँच सौ रुपए हर महीने देने का ऐलान किया था लेकिन वह भी नहीं मिल रहा है.'' नक्सली आंदोलन के प्रमुख नेता कानू सान्याल भी चाय बागान के मालिकों और तालाबंदी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं. वे कहते हैं कि सरकार अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रही है. राज्य के पूर्व मंत्री मनोहर तिर्की कहते हैं, ''मजदूरों के हित में सभी संगठनों को मिलकर आंदोलन छेड़ना होगा.'' फ़िलहाल समस्या बरकरार है. |
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