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भुखमरी से सरकार का इनकार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
खाने की भारी कमी और पेट की बीमारियों की मार झेल रहे उड़ीसा के कालाहांडी ज़िले में मरने वालों की कुल संख्या सैकड़ों में जा पहुँची है. राज्य सरकार मानने को तैयार नहीं है कि इन लोगों की मौत की असली वजह भूख है, राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री मनमोहन सामल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये लोग हैज़ा और डायरिया जैसी पेट की बीमारियों से मरे हैं. कालाहांडी के दूर-दराज़ के इलाक़े में मौजूद बीबीसी संवाददाता सलमान रावी का कहना है कि उन्हें ऐसे अनेक लोग मिले हैं जो बाँस के छिलके, पत्तों और आम की गुठलियों को उबालकर खा रहे हैं क्योंकि उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है. राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री ने बार-बार कहा कि इन मौतों का भूख से कोई संबंध नहीं है, उन्होंने कहा, "कालाहांडी में जो लोग मरे हैं वे पेट की हैज़ा जैसी बीमारियों से मरे हैं, इसमें जो ग़रीबी का चित्रण किया जा रहा है वह ग़लत है." जबकि कालाहांडी के कई दूर दराज़ के गाँव के लोगों ने बीबीसी संवाददाता को बताया कि वे अनाज न मिलने की वजह से मजबूरी में कई ऐसी चीज़ें खा रहे हैं जो नहीं खाना चाहिए जिसकी वजह से पेट की बीमारियाँ हो रही हैं. इनकार जब खाद्य आपूर्ति मंत्री के दावे को चुनौती दी गई कि बीबीसी के पास लोगों की आवाज़ में यह बात दर्ज है कि उन्हें नौ महीने से अनाज नहीं मिला, इस पर उन्होंने कहा, "यह एक दो जगह की बात है, हमने खाद्य आपूर्ति विभाग के कई कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया है और एक प्रखंड विकास अधिकारी को भी निलंबित किया जा रहा है." एक स्थानीय पत्रकार संदीप साहू का कहना है कि राज्य सरकार अभी भी वैसी मुस्तैदी नहीं दिखा रही है जो मीडिया में इतनी चर्चा के बाद अपेक्षित थी. संदीप साहू ने कहा, "इस इलाक़े में बरसों से लोग भूख से मरते रहे हैं लेकिन चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो कोई नहीं मानता कि भूख की वजह से कोई मरा है. मौत की असली वजह भूख और गरीबी ही है." मरने वालों की कुल संख्या को लेकर भी भारी भ्रम की स्थिति है, विपक्षी कांग्रेस पार्टी तो मरने वालों की संख्या 500 तक बता रही है, जबकि राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री का कहना है कि "अब तक 79 लोग कई बीमारियों की वजह से मरे हैं." प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था एक्शनएड और उड़ीसा के अन्य ग़ैर-सरकारी संगठनों के समूह संगति ने मिलकर इलाक़े का जो सर्वेक्षण कराया है उसके मुताबिक़ मरने वालों की संख्या 250 के क़रीब है. स्थानीय पत्रकार संदीप साहू कहते हैं, "एक्शनएड के सर्वेक्षण वाला आँकड़ा काफ़ी विश्वसनीय लगता है." एक्शनएड की वरिष्ठ कार्यकर्ता ब्रितिंडी जेना कहती हैं, "इस इलाक़े में बहुत समस्याएँ हैं, लोगों को खाद्यान्न नहीं मिल रहा, दुर्गम इलाक़ों में सरकारी तंत्र नहीं पहुँच पाता. आदिवासियों की दशा दिन पर दिन ख़राब होती जा रही है." उड़ीसा की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार इन मौतों को भूख से जुड़ा मानने को तैयार नहीं है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की उड़ीसा इकाई के अध्यक्ष जोएल उराँव कहते हैं, "दुर्गम इलाक़ा है, ज़मीनी स्तर पर कई समस्याएँ हैं, लोगों तक सरकारी सहायता पहुँचने में देरी हो जाती है, पानी की भी समस्या है, मेरा मानना है कि इस सबको ठीक करना हम सब लोगों की साझा ज़िम्मेदारी है." | इससे जुड़ी ख़बरें उड़ीसा में हैज़े से 80 की मौत27 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस बांग्लादेश में गंभीर कुपोषण की चेतावनी20 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस भुखमरी से मौत की संख्या में बढ़ोत्तरी09 दिसंबर, 2004 | पहला पन्ना लाखों बच्चे भूखे सोते हैं: यूनिसेफ़02 मई, 2006 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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