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पेट के लिए श्मशान चलाती है पुतसूया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पेट की आग लोगों से क्या-क्या नहीं कराती लेकिन इसके लिए कोई श्मशान चलाए और वह भी एक महिला तो सहज ही विश्वास नहीं होता. लेकिन यह सच है. पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के इच्छापुर में एक श्मशान का जिम्मा 72 साल की पुतसूया महतो के कमजोर कंधों पर ही है. आखिर वे इस राह पर क्यों चल रही हैं. पेश है पुतसूया की कहानी उसी की जुबानी. हाँ, मैं श्मशान चलाती हूं. यह मेरे जीवन का अटूट हिस्सा बन चुका है. क्या करूं ? अपना और घर के लोगों का पेट पालने के लिए मुझे यह काम करना पड़ता है. मैं यहाँ शव लेकर आने वाले को आग देती हूं ताकि अपने पेट की आग बुझा सकूं. इस उमर में मुझे कोई दूसरा काम तो मिलेगा नहीं. मैं सरकारी डोम नहीं हूं. लेकिन पेट की आग ने मुझे डोम बना दिया है. और फिर कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता. आख़िर बहू के अलावा अपनी नातिन का भी तो पेट पालना है. बहुत से लोगों को मुझे यह काम करते देख कर आश्चर्य होता है. वे कहते हैं कि पहले कभी किसी महिला को यह काम करते नहीं देखा. मैंने यह काम कोई शौक से थोड़े चुना है. लेकिन जब कंधों पर यह ज़िम्मेदारी उठाई है तो पूरी ईमानदारी से इसे निभाने का प्रयास करती हूं. नवाबगंज में हुगली के किनारे स्थित यह देवीतला श्मशान इलाक़े में सबसे पुराना है.छह साल पहले मेरे इकलौते बेटे रवि महतो को नगरपालिका की ओर से इस श्मशान की देख-रेख का ज़िम्मा मिला था. उसने लगभग तीन साल तक यह काम किया. लेकिन तीन साल पहले अचानक उसकी मौत हो जाने के कारण परिवार के सामने भुखमरी का संकट पैदा हो गया था. तभी मैंने यह काम अपने हाथों में लेने का फैसला किया. मैं लिखना-पढ़ना नहीं जानती. लेकिन यहां कुछ लिखने-पढ़ने की ज़रूरत ही नहीं है. जो लोग शव जलाने लाते हैं वे रजिस्टर में खुद ही नाम-पता लिख देते हैं. यहां शव जलाने के लिए कोई मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं देना पड़ता. वेतन श्मशान की देख-रेख के लिए मेरे बेटे को नगरपालिका से सात सौ रुपए महीने वेतन मिलता था. मुझे तीन सौ मिलता है.
लेकिन अंतिम संस्कार करने वाले लोग सौ-सौ रुपए देते हैं. इससे काम चल जाता है.यहीं श्मशान के एक कोने में मेरा एक टूटा-फूटा मकान है. पति की मौत तो काफी पहले हो गई थी. बेटे ने भी यहीं मेरी गोद में दम तोड़ दिया. इसलिए अब मैं हमेशा यहीं रहती हूं. अंतिम संस्कार के लिए आने वालों से मैं यहाँ दीवार पर लिखा मंत्र व नियम पढ़वाती हूं. अब तक तो हर महीने ठीक-ठाक पैसे मिल जाते थे. लेकिन अब दो-तीन महीनों से बगल में ही एक विद्युत शवदाहगृह खुल गया है. इससे यहाँ लोगों का आना कम हो गया हैं. अब मैं जब तक ज़िंदा हूं, यही काम करती रहूंगी. सरकार ज्यादा पैसा नहीं देती, इसलिए इस श्मशान की मरम्मत नहीं हो सकी है. परिवार में हम तीनों लोगों की जरूरतें और ख़र्च बहुत कम है. इसलिए किसी तरह काम चल ही जाता है. |
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