भट्टी हत्या: दो इरादों का इशारा

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- Author, आमेर अहमद खान
- पदनाम, बीबीसी उर्दू सेवा प्रमुख
पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी की हत्या के पीछे तात्कालिक तौर पर तो कोई वजह नज़र नहीं आती है.
देश के बदनाम हो चुके ईशनिंदा क़ानून के ख़िलाफ़ जो मोर्चा भट्टी ने खोला था, उस लड़ाई को केंद्र सरकार तभी छोड़ दिया था जब जनवरी 2011 में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या हुई थी.
<link type="page"><caption> शहबाज़ भट्टी जीवन परिचय</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/pakistan/2011/03/110302_shahbaz_profile_va.shtml" platform="highweb"/></link>
दरअसल, आख़िरी तौर पर समर्पण किसी और की तरफ़ से नहीं, बल्कि ख़ुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी की तरफ़ से तब हुआ जब उन्होंने फ़रवरी 2011 धार्मिक उलेमाओं की भारी भीड़ को संबोधित करते हुए यह कह दिया था कि ईश निंदा क़ानून की समीक्षा करने का सरकार का कोई इरादा नहीं है.
सलमान तासीर को तो वरिष्ठ राजनयिज्ञ, सामाजिक तौर पर ऊँचा क़द और राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के करोड़पति होने का दर्जा हासिल था लेकिन इसके उलट शहबाज़ भट्टी को ये दर्जा हासिल नहीं था और ना ही सरकार के एजेंडे पर भट्टी का कोई प्रभाव ही था.
इसीलिए फ़ेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों की तरफ़ से कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं आई है. पाकिस्तान के कुछ नामी-गिरामी उदारवादियों की तरफ़ से ज़रूर कुछ चिंता जताई गई है, उनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान में नहीं, बल्कि विदेशों में बसते हैं.
सलमान तासीर की हत्या के मिनटों बाद ही सोशल मीडिया में वाक स्वतंत्रता पर जो ज़ोरदार बहस छिड़ी थी, वो शहबाज़ भट्टी की हत्या के बाद नज़र नहीं आई. बल्कि जो ख़ामोशी नज़र आई उससे एक संदेश जाता है कि उग्रवादियों के एजेंडे को दरअसल कोई ख़तरा नहीं है.
इरादे और एजेंडे
इसकी सफ़ाई शायद सरकार और उग्रवादियों के अपने-अपने एजेंडे को समझने में मिल सकती है जिनके लिए इन दोनों ताक़तों का दृढ़ संकल्प है.

गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के बाद सरकार ने ईश निंदा क़ानून की समीक्षा करने का इरादा बड़े संदेहभरे अंदाज़ में त्याग दिया. सरकारी मंत्रियों को कहते सुना गया कि ये मधुमक्खियों का छत्ता है जिसमें हाथ ना ही डाला जाए तो बेहतर है.
देश के उदार राजनयिकों और सामाजिक नेताओं ने भी इसी सरकारी डगर पर अपने क़दम बढ़ाए हैं.
ये लोग इस उम्मीद में ख़ामोश रहे कि ईश निंदा क़ानून की समीक्षा करने का इरादा छोड़कर शायद उग्रवादी ताक़तों को संतुष्ठ और ख़ामोश रखा जा सकता है, ऐसा किसी वैचारिक संकल्प के तहत नहीं किया गया.
जबकि उग्रवादियों के लिए ये वैचारिक प्रतिबद्धता का मुद्दा है. उनके लिए इस बात की कोई अहमियत नहीं है कि शहबाज़ भट्टी की लड़ाई शुरू ही नहीं हुई थी या फिर वो कोई बेअसर और शक्तिहीन सरकारी मंत्री थे.
असल मुद्दा ये था कि उन्होंने बीते समय में ईश निंदा क़ानून के ख़िलाफ़ मुँह खोला था और मौक़ा मिलता तो वो फिर से ये बात कहते.
इसी रुख़ की वजह से शहबाज़ भट्टी उग्रवादियों का निशाना थे जिसे ना तो सहन किया जा सकता है और ना ही नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.
गवर्नर सलमान तासीर ने कहा था कि वो ईश निंदा क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखेंगे भले ही चाहें वो इस लड़ाई में आख़िरी व्यक्ति खड़े नज़र आएं, लेकिन वो बहुत देर तक खड़े नहीं रह सके.
अब शहबाज़ भट्टी की हत्या ने सरकार को एक और पक्का और ख़तरनाक संदेश भेजा है कि उग्रवादियों की लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक कि आख़िरी उदारवादी व्यक्ति भी गिर नहीं जाता.
इससे साफ़ नज़र आता है कि सरकार और उग्रवादियों को अपने-अपने संकल्प और इरादे कितने भिन्न हैं और पाकिस्तान में उदारवादियों के लिए तो ये एक बहुत ही हताशा भरी और ख़तरनाक स्थिति है.












