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बुश ने किए समझौते पर हस्ताक्षर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते को क़ानून बनाने की अंतिम औपचारिकता पूरी करते हुए राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने बुधवार को इस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. कांग्रेस के दोनों सदनों ने इसे पहले ही मज़ूर कर दिया था और इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होना ही बचा था. अब इस समझौते पर शुक्रवार, 10 अक्तूबर को भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी और अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस हस्ताक्षर करेंगे. इस अमरीकी क़ानून के साथ ही भारत के साथ असैनिक मकमसदों के लिए परमाणु ईंधन और तकनीक के व्यापार पर तीन दशकों से लगा हुआ प्रतिबंध ख़त्म हो जाएगा. इस समझौते को लेकर भारत में यूपीए सरकार को और अमरीका में बुश प्रशासन को बड़ी राजनीतिक मशक्कत करनी पड़ी है. हस्ताक्षर राष्ट्रपति बुश ने व्हाइट हाउस में सौ से ज़्यादा भारतीय मूल के गणमान्य अतिथियों, कई प्रभावशाली कांग्रेस के सदस्यों, पूर्व राजदूतों, उपराष्ट्रपति डिक चेनी, विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस और मीडिया की उपस्थिति में इस समझौते पर दस्तख़त किए. अमरीका में भारतीय राजदूत रॉनेन सेन भी इस समारोह में उपस्थित थे. उन्होंने कहा, "ये समझौता दुनिया के नाम एक संदेश है कि जो देश लोकतंत्र का रास्ता अपनाते हैं और ज़िम्मेदारी का परिचय देते हैं वो अमरीका को एक दोस्त की तरह पाएँगे." उनका कहना था, "इस समझौते से अगर भारत को अपने परमाणु बिजलीघरों के लिए भरोसेमंद ईंधन की आपूर्ति मिलेगी तो अमरीका को परमाणु उर्जा तकनीक का एक उभरता हुआ बाज़ार मिलेगा जिससे अमरीकी अर्थव्यवस्था में नौकरियाँ पैदा होंगी." राष्ट्रपति बुश के इस हस्ताक्षर से ठीक एक दिन पहले कांग्रेस के आठ सदस्यों ने उन्हें पत्र लिखकर ये आश्वासन मांगा था कि हस्ताक्षर करने के दौरान वो ऐसा कुछ न कहें जो समझौते के लिखित दस्तावेज़ का उल्लंघन करता हो.
भारत ने कांग्रेस में पेश समझौते के दस्तावेज़ पर कुछ चिंता व्यक्त की थी ख़ासकर कुछ लोगों का कहना था कि अगर भारत कभी परमाणु परीक्षण करता है तो इस समझौते के तहत इंधन की आपूर्ति तुरंत बंद कर दी जाएगी. राष्ट्रपति बुश ने कहा कि इस समझौते में वो हर कुछ है जो भारत के साथ 123 समझौते के तहत तय हुआ था. व्हाइट हाउस में इस समारोह के दौरान मौजूद जानेमाने लोगों में उद्योगपति और होटल चेन के मालिक संत चटवाल भी मौजूद थे. उन्होंने राष्ट्रपति बुश को उनकी कोशिशों के लिए धन्यवाद दिया. संत चटवाल का कहना था, "मैंने उनसे कहा कि हमारे प्रधानमंत्री आपको धन्यवाद दे रहे हैं और हम कभी नहीं भूल सकते कि कैसे आपने सुबह तीन बजे चीन के राष्ट्रपति को फ़ोन करके न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रूप में उनका समर्थन मांगा था." आगे क्या? यूएस इंडिया बिजनेस काउंसिल के प्रमुख रॉन सोमर्स ने बीबीसी को बताया कि दीवाली के फ़ौरन बाद अमरीका से परमाणु कंपनियों का एक दल भारत जाएगा जिसे वाणिज्य मंत्रालय का पूरा सहयोग मिलेगा और इसमें वो भारत के निजी क्षेत्र की भी पूरी भागीदारी चाहेंगे.
उनका कहना था काम तो अब बस शुरू हो रहा है. इस शुक्रवार को अब भारत और अमरीका के विदेश मंत्री इस समझौते को दोनों देशों के बीच लागू करने के लिए दस्तखत करेंगे और कई लोगों का मानना है कि बुश प्रशासन की विदेश नीति की गिनी चुनी उपलब्धियों में इस समझौते का अहम स्थान होगा. इसी तरह भारत की यूपीए सरकार भी इसे एक बड़ी उपलब्धि की तरह देख रही है. हालांकि उसे इसके लिए कड़े राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा है और सरकार को बाहर से साथ दे रहे वामपंथियों का समर्थन खोना पड़ा है. सहमति-असहमति अमरीका ने भारत के साथ परमाणु सहयोग पर वर्ष 1974 में प्रतिबंध लगा दिया था. वर्ष 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद तारापुर परमाणु केंद्र के लिए परमाणु ईंधन की सप्लाई बंद कर दी गई थी. वर्ष 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद ये प्रतिबंध और कड़े कर दिए गए थे. भारत सरकार का मानना है कि इस समझौते से उसे देश और अर्थव्यवस्था की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. भारत में अनेक विपक्षी दल इस तर्क से सहमत नहीं हैं. उधर समझौते के अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों का मानना है कि इससे परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद भारत को अपने परमाणु ऊर्जा उद्योग का विस्तार करने की अनुमति मिल जाएगी. अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस इस समझौते को 'ऐतिहासिक' बता चुकी हैं. |
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