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परमाणु समझौते का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत अमरीका असैन्य परमाणु समझौता एक ऐतिहासिक समझौता है. इस समझौते के साथ ही परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से चला आ रहा भारत का कूटनीतिक वनवास ख़त्म हो जाएगा. इस समझौते को लेकर भारत में मनमोहन सिंह सरकार को और अमरीका में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की सरकार को बड़े राजनीतिक और कूटनीतिक अड़चनों को पार करना पड़ा है. अब जबकि परमाणु समझौता लागू होने के लिए सिर्फ़ दो क़दम की दूरी रह गई है आइए एक नज़र डालते हैं इस समझौते में आए उतार-चढ़ाव पर... आठ अक्तूबर, 2008 अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने समझौते पर हस्ताक्षर की औपचारिकता पूरी की. इससे यह समझौता अमरीकी क़ानून बन गया.
दो अक्तूबर, 2008 अमरीकी सीनेट ने समझौते को मंज़ूरी दी. 27 सितंबर, 2008 अमरीकी संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा ने समझौते को 117 के मुक़ाबले 298 मतों से मंज़ूरी दी. 25 सितंबर, 2008 समझौता अमरीकी संसद में चर्चा और पारित करने के लिए पेश किया गया. 23 सितंबर, 2008 असैन्य परमाणु समझौते को सीनेट की समिति ने मंज़ूरी दी और इसे संसद में पेश करने का रास्ता साफ़ हुआ. छह सितंबर, 2008 परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों (एनएसजी) की विएना में हुई बैठक में लंबी मशक्कत के बाद समझौते को मिली मंज़ूरी. इसके साथ ही भारत के लिए परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लिए परमाणु सामग्री और तकनीक हासिल करने का रास्ता तीन दशक से भी अधिक समय बाद खुल गया. आठ अगस्त, 2008 अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने भारत के परमाणु कार्यक्रम की सुरक्षा के लिए समझौते को मंज़ूरी दे दी. परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों (एनएसजी) के साथ समझौते के लिए जाने के लिए भारत को यह समझौता करना ज़रूरी था.
22 जुलाई, 2008 यूपीए सरकार ने 19 मतों से विश्वास मत जीता. लेकिन सरकार के समर्थन हासिल करने के तौर तरीक़ों पर विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई और कहा कि सरकार ने सांसदों की ख़रीदफ़रोख़्त करके समर्थन हासिल किया. विश्वासमत से पहले संसद में भाजपा के सांसदों ने नोटों के बंडल दिखाए और कहा कि उन्हें यह पैसा विश्वासमत के दौरान अनुपस्थित रहने के लिए दिया गया. नौ जुलाई, 2008 वामपंथी दलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापसी का पत्र राष्ट्रपति को सौंपा और दावा किया कि सरकार अल्पमत में है. आठ जुलाई, 2008 आईएईए में जाने के मनमोहन सिंह की घोषणा से नाराज़ वामपंथी दलों ने सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी. सात जुलाई, 2008 जी-8 सम्मेलन के लिए जापान की यात्रा पर गए भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार जल्द ही परमाणु क़रार के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए के पास जाएगी. चार जुलाई 2008- वामपंथी दलों ने सरकार को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि वह सात जुलाई तक बताए कि क्या वह भारत-अमरीका परमाणु मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी(आईएईए) से वार्ता करने जा रही है. एक जुलाई 2008- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने कहा कि वह यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने पर विचार कर रही हैं. 25 जून 2008- परमाणु करार पर पैदा हुए गतिरोध को दूर करने के लिए यूपीए के घटक दलों की बैठक हुई. बैठक में कोई नतीजा नहीं निकल सका.
फ़रवरी 2008- अमरीका ने भारत से कहा कि वह राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश का कार्यकाल समाप्त होने से पहले परमाणु समझौता कर ले क्योंकि नई सरकार के आने पर नए सिरे समझौता करना पड़ेगा. दिसंबर 2007- वामपंथी दलों ने कहा कि सरकार आईएईए से बात करना बंद करे. नवंबर-2007- वामपंथी दलों ने अपने रुख़ में थोड़ी नरमी लाते हुए सरकार को परमाणु समझौते में भारत के हितों को लेकर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से बात करने की अनुमति दी. वामपंथी दलों ने बाद में सरकार पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाया. अक्तूबर-2007- कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि परमाणु करार के विरोधी, विकास विरोधी हैं. इसके बाद वामपंथी दलों और सरकार के घटक दलों के बीच बैठक हुई. जिसके बाद सरकार अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से संपर्क करने थोड़ी और देर करने को तैयार हुई. अगस्त-2007- अमरीका और भारत में होने वाले 123 समझौते के विवरण को दोनों देशों में एक साथ जारी किया गया. भारतीय विश्लेषकों ने कहा कि यह भारत की माँग के अनुरूप है. सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने कहा कि अगर सरकार ने यह समझौता किया तो वह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेंगे, क्योंकि यह समझौता देश की संप्रभुता के ख़िलाफ़ है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने समझौते का बचाव करते हुए इसे विकास के लिए ज़रूरी बताया. जुलाई-2007- दोनों देशों ने द्विपक्षीय समझौते पर महीने भर बातचीत के बाद समझौते को अंतिम रूप देने की घोषणा की. भारत ने कहा कि अगर इसमें कोई नई शर्त जोड़ी गई तो वह उसे स्वीकार नहीं होगा.
दिसंबर-2006- अमरीकी संसद की ओर से बनाए गए क़ानून पर राष्ट्रपति जार्ज बुश ने दस्तख़त किए. इसमें अमरीका परमाणु ऊर्जा क़ानून में बदलाव किए गए थे. विशेषज्ञों ने कहा कि अगल छह महीनों में समझौते को मंजूरी मिल सकती है. दिसंबर-2006- अमरीकी संसद ने समझौते का अनुमोदन किया. भारत को अंतिम रूप से परमाणु हस्तांतरण के लिए 45 सदस्यों वाले परमाणु सप्लाई ग्रुप, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और अमरीकी संसद से एक और मंजूरी ज़रूरी है. मार्च-2006- अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारत की तीन दिनों की यात्रा की. इस दौरान भारत के रक्षा और नागरिक उपयोग के परमाणु रियेक्टरों को अलग- अलग करने की योजना पर दोनों देशों में सहमति बनी. जुलाई-2005- प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमरीकी राष्ट्रपित जार्ज डब्ल्यू बुश परमाणु करार पर सैद्धांतिक रूप से सहमत हुए. यह समझौता पिछले तीस सालों से भारत के साथ परमाणु समझैता न करने की नीति को उलटने वाला था. |
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