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परमाणु समझौते को सीनेट की हरी झंडी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-अमरीका असैनिक परमाणु समझौते को अमरीकी सीनेट की मंज़ूरी मिल गई है. इसी के साथ परमाणु ईंधन और तकनीक के व्यापार में भारत पर तीन दशकों से लगी रोक ख़त्म होने का रास्ता साफ़ हो गया है. बुधवार को अमरीकी सीनेट में मतविभाजन हुआ और 86-13 के वोट से उस समझौते को मंज़ूरी मिल गई जिसकी प्रक्रिया जुलाई 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के संयुक्त बयान से हुई थी. अब इस समझौते पर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के हस्ताक्षर होने हैं. इसके बाद भारत के साथ असैनिक मकमसदों के लिए परमाणु ईंधन और तकनीक के व्यापार पर तीन दशकों से लगा हुआ प्रतिबंध ख़त्म हो जाएगा. महत्वपूर्ण है कि भारत में इस मामले पर तीख़ी राजनीतिक बहस होती रही है और यहाँ तक कि हाल में मनमोहन सरकार को इस मुद्दे पर लोकसभा में विश्वास मत भी हासिल करना पड़ा. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की मंज़ूर और फिर अमरीकी कांग्रेस यानी प्रतिनिधि सभा की मंज़ूरी का लंबा रास्ता तय करने के बाद ये समझौता अपने अंतिम चरण में पहुँचा है. अमरीकी संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा ने भारत-अमरीका परमाणु समझौते को 117 के मुक़ाबले 298 मतों से पारित किया था. 'नया अध्याय शुरु' अमरीका ने भारत के साथ परमाणु सहयोग पर वर्ष 1974 में प्रतिबंध लगा दिया था. वर्ष 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद तारापुर परमाणु केंद्र के लिए परमाणु ईंधन की सप्लाई बंद कर दी गई थी. वर्ष 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद ये प्रतिबंध और कड़े कर दिए गए थे. भारत सरकार का मानना है कि इस समझौते से उसे देश और अर्थव्यवस्था की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. भारत में अनेक विपक्षी दल इस तर्क से सहमत नहीं हैं. उधर समझौते के अंतरराष्ट्रीय आलोचकों का मानना है कि इससे परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद भारत को अपने परमाणु ऊर्जा उद्योग का विस्तार करने की अनुमति मिल जाएगी. अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस इस समझौते को 'ऐतिहासिक' बता चुकी हैं. समझौते को सीनेट की मंज़ूरी मिलने के बाद अमरीका में भारतीय राजदूत रौनेन सेन का कहना था, "वर्ष 1974 में तारापुर संयंत्र के लिए परमाणु ईंधन देने पर अमरीका के इनकार के बाद अब इतिहास ने फिर करवट ली है. ये समझौता न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहतर है क्योंकि ये इतिहास में एक नई शुरुआत है." |
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