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भारत-अमरीका संबंधों पर असर पड़ेगा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के राष्ट्रपति बुश ने यह कहकर भारत के अधिकारियों को हैरानी में डाल दिया है कि परमाणु सहयोग समझौते के तहत भारत को परमाणु ईंधन उपलब्ध कराने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है. भारत पिछले तीन साल से यही समझ रहा था कि अमरीका ईंधन की अबाध आपूर्ति की वैधानिक गारंटी दे रहा है लेकिन अब बुश ने भारत से किया गया वादा तोड़ने के संकेत दिए हैं, कम से कम संदेह तो पैदा कर ही दिया है. समझौते में साफ़ लिखा है कि ईंधन की आपूर्ति क़ानूनी बाध्यता है, अगर बुश इससे मुकर रहे हैं तो भारत के लिए समझौते पर हस्ताक्षर करना बहुत मुश्किल हो जाएगा क्योंकि इस समझौते का कोई महत्व नहीं रह जाएगा. इसका असर भारत-अमरीका के द्विपक्षीय संबंधों के हर पहलू पर पड़ने वाला है. भारत-अमरीका के बीच परस्पर विश्वास का प्रश्न है और भारत के लिए बड़ी कठिनाई पैदा हो गई है कि इस रिश्ते को किस तरह आगे बढ़ाया जाए. एक तरह से अमरीका ने भारत को नोटिस दे दिया है कि वह कभी भी ईंधन की आपूर्ति रोक सकता है, उसकी कोई क़ानूनी गारंटी नहीं है, यह अपने आप में ऐसी स्थिति है कि भारत की कोई भी लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हूई सरकार अमरीका से न्यूक्लियर रिएक्टर नहीं ख़रीदना चाहेगी. न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) से मान्यता मिलने के बाद भारत स्थिति में आ गया है कि वह सिर्फ़ अमरीका ही नहीं, दूसरी परमाणु शक्तियों से सहयोग बढ़ा सकता है. अगर भारत को रिएक्टर ख़रीदना है तो उसे रूस या फ्रांस ख़रीदना बेहतर होगा. एनएसजी से भारत को जो मंज़ूरी मिली है उसने यह रास्ता खोल दिया है कि वह फ्रांस और रूस जैसे देशों से परमाणु ईंधन, उपकरण और टेक्नॉलॉजी ख़रीद सके. जटिलताएँ अगर इस समझौते के साथ अमरीकी संसद ने बुश की उस ताज़ा चिट्ठी को भी जोड़ दिया जिसमें कोई क़ानूनी गारंटी नहीं होने की बात कही गई है तो भारत के लिए उस पर हस्ताक्षर करना बहुत मुश्किल हो जाएगा. भारत के पास अपने रुख़ पर अड़े रहने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है, भारत को मानना होगा कि 123 समझौते की व्याख्या को लेकर दोनों देशों में गहरे मतभेद हैं. अमरीका जिन लिखित-अलिखित शर्तों के साथ भारत को परमाणु तकनीक और ईंधन देगा वे काफ़ी कठिन शर्तें होंगी. अमरीका को अच्छी तरह पता है कि किस चीज़ का फ़ायदा कहाँ हो सकता है, वह अलग-अलग क्षेत्रों में फ़ायदा वसूलना अच्छी तरह जानता है, ज़रूरी नहीं है कि वह फ़ायदा न्यूक्लियर क्षेत्र में ही हो, वह रक्षा के क्षेत्र में या व्यापार के क्षेत्र में भी हो सकता है. अमरीका की संसद क्या फ़ैसला लेती है और कैसे आगे बढ़ती है, उसका अन्य देशों के साथ भारत के परमाणु सहयोग पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. कोई बहुत ही बहादुर सरकार होगी वह इस तरह की गतिविधियों के बीच अरबों-खरबों रूपए खर्च करके अमरीका से न्यूक्लियर उपकरण खरीदेगी. वैसे भी इस समझौते को लागू होने में कम से कम दो साल लगेंगे यानी अगली सरकार को भी इसकी जटिलताओं से जूझना होगा. |
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