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एनएसजी बैठक में अनिश्चय बरक़रार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वियना में न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनसजी) के साथ भारतीय अधिकारियों की बैठक में अब भी अनिश्चय की स्थिति बरकरार है. शुक्रवार को देर रात तक सभी पक्षों के बीच बातचीत और विचार विमर्श का सिलसिला जारी रहा पर अभी तक किसी तरह का संकेत भी नहीं दिया गया है. जानकार बताते हैं कि निर्णायक दौर में पहुँच चुकी इस बैठक के निर्णय के बारे में कोई भी कयास लगाना जल्दबाज़ी होगी. पर इतना तो माना जा रहा है कि भारत के लिए एनएसजी के सदस्य देशों के बीच आम सहमति बना पाना आसान नहीं है. ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में लगातार दूसरे दिन चल रही बातचीत में भी कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी है. अनिश्चय की स्थिति एनएसजी के छह सदस्य देश भारत को परमाणु ईंधन उपलब्ध कराए जाने के मामले पर अमरीका के रुख़ से सहमत नहीं हैं.
इन सदस्य देशों का कहना रहा है कि भारत को परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) और व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर किए बगैर परमाणु ईंधन नहीं उपलब्ध कराया जाना चाहिए. वियना में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी की घोषणा के बाद माहौल थोड़ा बेहतर हुआ है, मुखर्जी ने कहा है कि परमाणु परीक्षणों पर भारत ने स्वेच्छा से जो रोक लगा रखी है वह जारी रहेगी और किसी अन्य देश को परमाणु जानकारी देने का सवाल ही नहीं है. इसके बाद शुक्रवार को विदेशमंत्री ने बातचीत के बारे में बताते हुए कहा कि अभी कोई भी आकलन जल्दबाज़ी है क्योंकि बातचीत अभी भी चल रही है. अगर शुक्रवार की बैठक में समझौता नहीं हो पाता है तो पूरी परमाणु सहयोग संधि ख़तरे में पड़ सकती है. किसी तीसरी बैठक के लिए मसौदा में बड़े संशोधन करने होंगे जो भारत के लिए आसान नहीं होगा. इस समझौते की वजह से वामपंथी दल पहले ही सरकार से समर्थन वापस ले चुके हैं और अगर इस बैठक में सहमति नहीं बन पाती है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के स्थिति काफ़ी जटिल हो जाएगी. |
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