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परमाणु समझौते को लेकर अहम बैठक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सोमवार से वॉशिंगटन में एक अहम बैठक होने जा रही है जिसमें भारत और अमरीका के बीच असैनिक परमाणु समझौते की बाधाओं को दूर करने की कोशिश होगी. भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन वॉशिंगटन में हैं और अमरीका की ओर से विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स इस बैठक में शामिल होंगे. यह बैठक दो दिन चलेगी. इस असैनिक परमाणु समझौते को लेकर भारत और अमरीका के बीच दो बड़े मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही है. एक तो अमरीका चाहता है कि भारत परमाणु परीक्षण न करने का वादा करे, जबकि भारत चाहता है कि परमाणु परीक्षण का विकल्प खुला रहे. दूसरा मुद्दा परमाणु बिजली घरों से निकलने वाले परमाणु ईंधन का है. अमरीका चाहता है कि भारत इसके उपयोग को सार्वजनिक करे. जबकि भारत इसका विरोध कर रहा है. अमरीका को अंदेशा है कि भारत इसका उपयोग अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को बढ़ाने के लिए कर सकता है. उल्लेखनीय है कि भारत और अमरीका के बीच जुलाई 2005 में असैनिक परमाणु समझौते को लेकर सहमति हुई थी. इस सहमति के तहत अमरीका परमाणु अप्रसार समझौते पर हस्ताक्षर किए बिना भारत को परमाणु सहयोग देने के लिए तैयार हो गया है. अमरीका नाख़ुश हालांकि अमरीकी संसद ने इस परमाणु समझौते को स्वीकृति दे दी है और इसके लिए अमरीकी क़ानून में संशोधन भी किया गया है. लेकिन दोनों देशों के बीच मुद्दों को लेकर असहमतियों को दूर करने में काफ़ी वक़्त लग रहा है. अमरीका ने इस देरी को लेकर चिंता और अप्रसन्नता ज़ाहिर की है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता श्याँ मैककॉर्मक ने कहा है, "परमाणु समझौते को लेकर वार्ता जिस तरह से चल रही है उसे लेकर अमरीकी प्रशासन और संसद दोनों में निराशा है."
विशेषज्ञों का भी कहना है कि इस समझौते पर भारत को तेज़ी लानी होगी. इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफ़ेंस एंड एनालिसिस के विज़िटिंग फ़ैलो जी बालाचंद्रन का कहना है, "समझौते में हो रही देरी को लेकर गंभीर चिंताएँ हैं. आख़िर वे भारत को ब्रह्मांड के केंद्र में तो नहीं ही देखते." उनका कहना है कि अमरीका अगले साल राष्ट्रपति चुनाव में उलझ जाएगा और इसलिए वह चाहता है कि यह मामला जल्दी ही निपट जाए. लेकिन भारत इस मामले में अमरीका की टिप्पणियों को लेकर बहुत गंभीर नहीं दिख रहा है. पिछले हफ़्ते ही संसद में एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का रुख़ इस मामले में 'बहुत साफ़' है. भारत कहता रहा है कि वह इस समझौते के तहत अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा. जबकि बहुत से भारतीय वैज्ञानिकों को आशंका है कि इस समझौते से भारत को अपने परमाणु हितों के साथ समझौता करना होगा. बीबीसी के वॉशिंगटन संवाददाता शाहज़ेब जिलानी का कहना है कि परमाणु समहति को लेकर दोनों देशों के बीच पिछले चार महीनों में कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं और इसमें दोनों के बीच अहम मतभेद ही उभरकर सामने आए हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें परमाणु सौदे पर भारत के तेवर कड़े18 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस 'परमाणु परीक्षणों पर रोक मंज़ूर नहीं'10 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु करार पर बुश-मनमोहन की चर्चा21 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु सहमति भारत के हित में?22 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 'नई शर्तें स्वीकार नहीं करेगा भारत'26 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस 'सामरिक कार्यक्रम पर कोई अंकुश नहीं'07 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भारत-अमरीका सहमति ऐतिहासिक क्यों?02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भारत-अमरीका में परमाणु सहमति02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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