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'सामरिक विकल्प तंग हुए हैं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के समारिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि इस समझौते से भारत के सामरिक विकल्प तंग हो रहे हैं. वे मानते हैं कि भारत इस समझौते के लिए ऐसे कई क़दम उठाने के लिए तैयार हो गया है जो कई परमाणु संपन्न देश उठाने के लिए तैयार नहीं है. उनका कहना है कि इस समझौते से परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों को अरबों डॉलर का फ़ायदा होने वाला है. बीबीसी के संवाददाता नलिन कुमार से हुई बातचीत में ब्रह्मा चेलानी ने कहा है कि आईएईए से लेकर एनएसजी की मंज़ूरी तक भारत ने समझौते ही समझौते किए हैं. उन्होंने कहा, "इस क़रार के साथ बहुत सारी शर्ते जुड़ी हुई हैं. जब अमरीका ने समझौते का दस्तावेज़ बनाया था तो कांग्रेस में तो उसमें शर्ते जोड़ी थीं. जब द्विपक्षीय वार्ता हुई तो उसमें और शर्ते जोड़ी गईं और हाल ही में आईएईए के साथ सुरक्षा समझौता किया तो उसमें भी शर्ते लगाई गईं." वे कहते हैं, "अब एनएसजी ने जो मंज़ूरी दी है उस की जो भाषा है वो सार्वजनिक नहीं हुई है. जब वो सार्वजनिक होंगी तब ही पता चलेगा कि उसमें शर्ते क्या हैं. बिना देखे कहना कि ये वेवर बिना शर्तों के मिला है, ग़लत होगा." ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि परमाणु परीक्षण को लेकर भारत ने जो ख़ुद पर जो एकतरफ़ा रोक लगा रखी है वो अब एक तरह से बहुपक्षीय रोक बन रही है और संवैधानिक रुप ले रही है." वे मानते हैं कि यह एक गभीर बात है क्योंकि भारत के पास जो रणनीतिक या सामरिक विकल्प हैं वो तंग हो रहे हैं. चेलानी मानते हैं कि इसके अलावा भारत ने कई दायित्व ले लिए हैं जो दूसरा कोई परमाणु संपन्न देश लेने के लिए तैयार नहीं है. जैसे असैन्य और सैन्य परमाणु कार्यक्रम अलग अलग करना. उनका कहना है कि भारत का जो सुरक्षा पर्यावरण है वो काफ़ी परमाण्विक है. इसराइल से लेकर चीन तक कई पड़ोसी हैं जो कि परमाणु संपन्न हैं, तो इस तरह के अस्थिर परिवेश में अगर भारत अपने भविष्य के विकल्पों पर कोई पाबंदी लगाता है तो वो उसके हित में नहीं है. यह पूछने पर कि इससे किसे फ़ायदा होगा, वे कहते हैं कि यह समझौता बिजली पैदा करने के लिए है. इससे बिजली पैदा होगी तो ये भारत आर्थिक पहलू से अच्छा बात है. मगर दुनिया में देखिए पश्चिम में कितने पॉवर रिएक्टर बन रहे हैं. अमेरिका में एक भी नहीं, यूरोप में एक रिएक्टर बन रहा है एक फ़िनलैंड और एक फ़्रांस में. चेलानी कहते हैं, "ये जो परमाणु निर्यातक देश हैं उनके लिए यह समझौता बड़े फ़ायदे का सौदा है और इसी वजह से रूस और फ़्राँस, ब्रिटेन और जर्मनी इस क़रार के बहुत बड़े समर्थक रहे हैं. क्योंकि उनके लिए करोड़ो रूपयों का कारोबार खुलेगा." उनका मानना है कि इस तरह के परमाणु संयंत्र ख़रीदकर अपने आपको परमाणु मामले में आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश अच्छी नहीं है जिसमें ईंधन की आपूर्ति रुक जाएगी तो सब कुछ रूक जाएगा. ब्रह्मा चेलानी मानते हैं कि भारत ने इस समझौते के ज़रिए सामरिक रुप से अपने आपको सीमाओं में बाँध लिया है. वे कहते हैं, "जहाँ तक सीटीबीटी की बात है तो यह वैश्विक स्तर पर परमाणु परीक्षण को रोकने वाली संधि है. ये लागू हुआ नहीं है क्योंकि कई देशों ने इसे मंजूर नहीं किया. लेकिन भारत ने सीटीबीटी के जो दायित्व हैं वो ख़ुद होकर स्वीकार कर लिए हैं." इसी तरह एनपीटी के मामले में वो कहते हैं कि भारत परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) में जा तो नहीं रहा है लेकिन उसमें गए बिना वह उसकी सारी शर्तें मानने को तैयार हो गया है. अमरीकी के मंशे पर किए गए सवाल पर वे कहते हैं, "ये क़रार अमरीका की विदेशी रणनीति का हिस्सा है. वो कभी भी इसे भारत के खिलाफ़ इस्तेमाल कर सकता है. रूस के साथ अमरीका ने एक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. और इसी हफ़्ते उसने घोषणा की है वो इस क़रार को ख़त्म कर रहा है. क्योंकि जॉर्जिया के मसले पर वो रूस को दंड देना चाहता है." वे कहते हैं, "तो अगर अमरीका रूस के साथ, जो कि परमाणु मामले में एक बड़े देश है, क़रार ठप्प कर सकता है तो भारत के साथ भी वो ऐसा कर सकता है." | इससे जुड़ी ख़बरें परमाणु समझौते को एनएसजी की मंज़ूरी06 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस परमाणु समझौते को आईएईए की मंज़ूरी01 अगस्त, 2008 | पहला पन्ना 'अप्रसार क्षेत्र में क़रार बड़ी सफलता'31 जुलाई, 2008 | पहला पन्ना 'सामरिक कार्यक्रम पर समझौता नहीं'26 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस परमाणु करार में आए उतार-चढ़ाव04 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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