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'ईंधन आपूर्ति की क़ानूनी बाध्यता नहीं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने यह कहकर भारत को चिंता में डाल दिया है कि परमाणु की ईंधन की 'आपूर्ति की क़ानूनी बाध्यता नहीं है'. बुश ने भारत के साथ हुए 123 समझौते को अमरीकी संसद में रखते हुए ये विचार व्यक्त किए हैं. एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में बुश के इस विचार पर आश्चर्य प्रकट किया है और माना जा रहा है कि भारत जल्द ही अमरीका से स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहेगा. भारतीय सूत्रों का कहना है कि 123 समझौते में स्पष्ट लिखा है कि इसके लागू होने के बाद भारत को परमाणु ईंधन की अबाध आपूर्ति कराना अमरीका की ज़िम्मेदारी होगी. भारत अमरीका परमाणु समझौते पर क़रीब से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं, "समझौते में साफ़ लिखा है कि ईंधन की आपूर्ति क़ानूनी बाध्यता है, अगर बुश इससे मुकर रहे हैं तो भारत के लिए समझौते पर हस्ताक्षर करना बहुत मुश्किल हो जाएगा." 123 समझौते के मुताबिक़ यह अमरीका की ज़िम्मेदारी होगी कि वह 'अंतरराष्ट्रीय परमाणु ईंधन बाज़ार से निर्बाध रूप से पर्याप्त कच्चा माल भारत को उपलब्ध कराने में' मदद करेगा. इससे पहले भी इस तरह की स्थिति पैदा हो चुकी है जब अमरीकी विदेश विभाग की एक चिट्ठी मीडिया में लीक हो गई थी जिसमें कहा गया था कि अगर भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो अमरीका परमाणु ईंधन की सप्लाई बंद कर देगा. इस चिट्ठी के लीक होने के बाद भारत के प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दलों, ख़ास तौर पर भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दलों ने सरकार की कड़ी आलोचना की थी और समझौते को लेकर अपनी चिंता को ज़ोरदार तरीक़े से दोहराया. भाजपा बंगलौर में चल रही भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान इस मुद्दे पर ज़ोर-शोर से चर्चा हुई. भाजपा का कहना है कि इस बयान से उनकी चिंता सही साबित हुई है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करके "भारत अपनी परमाणु नीति की स्वतंत्रता को गिरवी रख रहा है". भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि बुश के इस ताज़ा बयान से स्पष्ट हो गया है कि "भारत सरकार ने कई जानकारियाँ देश की जनता से छिपाईं". भारत सरकार की ओर से इस पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. |
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