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बुधवार, 30 जुलाई, 2008 को 09:32 GMT तक के समाचार
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अमरीकी जंग के 'चेहरे' की मौत का सच

इराक़ में अमरीकी सैनिक
इराक़ में तैनात अमरीकी सैनिक के कई तरह के तनाव से गुजरने की शिकायतें मिलती रही हैं
25 मार्च, 2003. सुबह होने को थी लेकिन अँधेरा छंटा नहीं था. इराक़ पर अमरीकी हमले का पहला हफ़्ता था.

दक्षिणी बग़दाद में अमरीकी फ़ौज पर चारों तरफ़ से गोलीबारी हो रही थी और थोड़ी ही देर में अमरीकी विमानों ने बम बरसाना शुरू कर दिया.

ज़मीन काँपने लगी, धूल के ग़ुबार उठने लगे. अब तक रौशनी इतनी हो चुकी थी कि आसपास की चीज़ें नज़र आ जाएँ.

अचानक धूल के ग़ुबारों को चीरता हुआ एक इराक़ी आदमी अमरीकी फ़ौज की तरफ़ भागता हुआ आया, उसकी गोद में था चार साल का एक अधनंगा बच्चा, बांया पाँव ख़ून से बुरी तरह लथपथ.

बिजली की तेज़ी से एक अमरीकी फ़ौजी उसकी तरफ़ लपका, बच्चे को अपनी गोद में उठाया, और वापस भागा अपनी छावनी की तरफ़, इराक़ी दौड़ा वापस अपने गांव की तरफ़.

गोलीबारी और बमबारी के बीच, एक घायल इराक़ी बच्चे को गोद में उठाकर भागते हुए उस अमरीकी फ़ौजी की तस्वीर अगले दिन और अगले कई हफ़्तों तक दुनिया के अख़बारों और पत्रिकाओं के फ्रंट पेज पर थी.

अमरीका की छवि के लिए शायद इससे बेहतर कोई तस्वीर नहीं हो सकती थी.

सेलिब्रिटी

उस चार साल के बच्चे, अली सत्तार का क्या हुआ, नहीं पता. लेकिन फ़ोटोग्राफ़र वारेन ज़िन की ली हुई उस तस्वीर ने एक गुमनाम से फ़ौजी, जोसेफ़ ड्वायर को रातोंरात एक सेलिब्रिटी बना दिया.

इराक़ में अमरीकी सैनिक
सैनिक ज़ंग से लौटने के बाद भी वहाँ की यादों से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं

इस महीने फ़ोटोग्राफ़र वारेन ज़िन के पास एक इमेल आया, लिखा हुआ था, जिस फ़ौजी जोसेफ़ ड्वायर को आपने रातोरात मशहूर कर दिया था, इस 28 जून को उसकी मौत हो गई.

हज़ारों दूसरे अमरीकी सैनिकों की तरह उसे भी पूरे फ़ौजी सम्मान के साथ दफ़ना दिया गया.

लेकिन जोसेफ़ ड्वायर की मौत इराक़ में किसी बम हमले में नहीं हुई, अफ़गानिस्तान में तालेबान के हाथों भी नहीं हुई. उसने ड्रग का ओवरडोज़ लेकर अपनी जान ख़ुद ही ले ली.

पिछले तीन सालों से वो मानसिक तनाव से ग्रस्त था. वो सो नहीं पाता था क्योंकि सपने में उसे अपने पीछे भागते हुए इराक़ी चरमपंथी नज़र आते थे.

वारेन ज़िन ने जिस चेहरे को इतने करीब से देखा, और उसकी मौत के बाद जिसके बारे में लिखा, वो जोसेफ़ ड्वायर इराक़ युद्द का वो चेहरा है जो टेलीविज़न स्क्रीन पर नहीं दिखता लेकिन युद्ध से लौटे हज़ारों अमरीकी फ़ौजी इन दिनों ऐसी ही मानसिक यातनाओं से जूझ रहे हैं.

परिवार का दुख

इराक़ में अमरीकी सैनिक
इराक़ में अमरीकी सैनिकों को आत्मघाती हमलावरों से भी जूझना पड़ रहा है

कई ऐसे हैं जो वापस अपनी पुरानी ज़िदगी में अपने आपको फ़िट नहीं कर पा रहे. कोई ड्रग्स का सहारा ले रहा है तो बहुत ऐसे भी हैं जो वापस युद्धभूमि में ही लौट जाना चाहते हैं.

युद्द के बारे में पुरानी कहावत है. आप युद्ध में अकेले नहीं जाते, साथ में आपका परिवार, आपके बच्चे भी जाते हैं. वो मिसाइलों और बमों का सामना नहीं करते, लेकिन हज़ारों मील दूर बैठकर एक दूसरी ही यातना के शिकार होते हैं.

क्योंकि जब ये फ़ौजी लौटते हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जिनका एक हिस्सा युद्ध की भेंट चढ़ चुका होता है, कभी केवल मानसिक तौर पर कभी शारीरिक तौर पर.

एक छोटी सी बच्ची जो अपने पापा से कहानी सुनकर ही रात में सोती थी, अब उन्हें घर के कोने में हमेशा अनमना सा बैठा हुआ पाती है. एक बच्चा जो अपने पिता के साथ उछल-कूद करते बड़ा हो रहा था, अब उन्हें व्हील चेयर पर बैठा हुआ पाता है.

और ये परिवार बिखर नहीं जाएँ, ये बच्चे अंदर ही अंदर इतने आहत नहीं हो जाएँ कि आगे चलकर संभल न सकें, अब इसकी कोशिश हो रही है.

क्यूबा गूडिंग जूनियर जैसे जानेमाने हॉलीवुड के सितारे युद्द पर जा रहे या वहां से लौटे सैनिकों और उनके परिवारों के लिए वर्कशॉप का आयोजन कर रहे हैं जिसका मंत्र है- बोलो, सुनो और जुड़ो.

बच्चों का एक लोकप्रिय कार्टून प्रोग्राम, सेसमी स्ट्रीट अपने चरित्रों को युद्ध से लौटे सैनिक के परिवारों के हिस्से की तरह पेश कर रहा है जिससे अग़र ज़रूरत पड़े तो बच्चे ऐसे माहौल में अपने को ढाल पाएँ.

इराक़ युद्ध ने इराक़ियों के लिए जितने ज़ख़्म दिए हैं, जितनी बर्बादी वहां हुई है, जितने बच्चे वहां अनाथ और अपंग हुए हैं शायद उसके मुक़ाबले ये दर्द उतना बड़ा नहीं दिखता बल्कि ये सोच भी हावी होती है कि सबकुछ किया हुआ तो अमरीका का ही है.

लेकिन जब ये सोचें कि फ़ौजी चाहे वो भारत का हो, पाकिस्तान का हो, अमरीका का हो, बस हुक्म की तामील करता है तो शायद इन अमरीकी परिवारों का दर्द महसूस हो पाता है.

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