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सोमवार, 28 जुलाई, 2008 को 13:14 GMT तक के समाचार
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इराक़ में बम धमाके, 47 की मौत
घायल
बग़दाद में जिस समय हमला हुआ तो लोग तीर्थयात्रा पर जा रहे थे
इराक़ की राजधानी बग़दाद और किरकुक में हुए आत्मघाती बम हमलों में 47 लोग मारे गए हैं और 240 लोग घायल हुए हैं.

बग़दाद में हुए तीन धमाकों में कम से कम 25 शिया मुसलमान मारे गए. पुलिस का कहना है कि ये हमले महिला आत्मघाती हमलावरों ने किए.

ये लोग शिया बहुल ज़िले कज़ीमिया में आठवीं सदी के इमाम मूसा-अल-काज़िम की मज़ार पर जा रहे थे. एएफ़पी के मुताबिक मृतकों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं.

तीर्थयात्रा को देखते हुए बग़दाद में कड़े सुरक्षा इंतज़ाम किए गए थे.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि शिया धार्मिक आयोजनों के दौरान अकसर बम हमले होते रहे हैं और इनके लिए आम तौर पर सुन्नी चरमपंथियों को दोषी ठहराया जाता रहा है.

वहीं किरकुक में आत्मघाती हमलावर ने कुर्द प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया. इस हमले में 22 लोगों की मौत हो गई. कुर्द और अरब समुदायों के बीच किरकुक को लेकर विवाद चल रहा है.

स्थानीय चुनावों को लेकर एक प्रस्तावित क़ानून के विरोध में ये लोग प्रदर्शन कर रहे थे.

कड़ी सुरक्षा

पिछले साल इराक़ में बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा हुई थी. लेकिन सुन्नी चरमपंथियों और शिया मिलिशिया के ख़िलाफ़ उठाए गए अमरीकी और इराक़ सरकार के क़दमों के बाद इसमें कमी आई है.

लेकिन बीबीसी संवाददाता का कहना है कि भीड़ के बीच पैदल चल रहे आत्मघाती हमलावरों को रोकना मुश्किल काम है, ख़ासकर अगर वे महिला हमलावर हों.

तीर्थयात्रा का समापन मंगलवार को होगा जब एक लाख से ज़्यादा श्रद्वालु आएँगे.

बग़दाद में इराक़ी सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल क़ासिम अल मौसवी ने एएफ़पी को बताया कि इस दौरान करीब एक लाख इराक़ी सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया जाएगा.

एपी के मुताबिक महिला तीर्थयात्रियों की तलाशी लेने के लिए करीब 200 महिला कार्यकर्ताओं की मदद ली जा रही है.

बम धमाकों के बावजूद कई शिया तीर्थयात्रियों का कहना है कि वे अपनी यात्रा जारी रखेंगे.

एक यात्री जासिम जिहाद ने कहा, "हम इमाम काज़िम की मज़ार पर जा रहे हैं. हमें बम धमाकों और मौत की कोई परवाह नहीं. हमें ख़ुदा पर भरोसा है."

विशेषज्ञों के अनुसार अल क़ायदा समेत कई सुन्नी गुट ये जताना चाहेंगे कि भले ही सुन्नियों का गढ़ माने जाने वाले इलाक़ों में वे कमज़ोर पड़े हों लेकिन उनमें अब भी दमखम बाक़ी है.

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि किरकुक में हुई हिंसा को दूसरे संदर्भ में देखना होगा. वहाँ तीन मुख्य जनजातीय गुटों में सत्ता संघर्ष चल रहा है.

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