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मंगलवार, 24 जून, 2008 को 14:11 GMT तक के समाचार
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अजीब विसंगतिओं वाला देश अमरीका

अमरीका का दृश्य
वाशिंगटन डीसी का एक खुशनुमा दिन. भारत से आए एक राजनेता का ऊबाउ सा भाषण सुनकर समय की बर्बादी के लिए अपने आप को कोसता हुआ, दफ़तर की ओर लौट रहा था.

टैक्सी में बैठा ही था कि लंदन से बीबीसी उर्दू सर्विस से फ़ोन आया,बातचीत हुई.

उधरवाले ने ख़ुदा हाफ़िज़ कहा...जवाब में मैने भी ख़ुदा हाफ़िज़ कहा.

टैक्सी ड्राइवर ने पूछा जनाब आप पाकिस्तान से हैं. मैने कहा ज़्यादा दूर नहीं भारत से हूं. पहले हंसा फिर थोड़ा झिझकते हुए पूछा..मुसलमान हैं. मैने कहा नहीं हिंदू हूँ.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद थोड़ी गंभीर आवाज़ में उसने कहा, मैं इन दिनों बेहद परेशान हूँ.आपसे एक दरख़्वास्त कर सकता हूं. पत्रकार का शक्की मन चौकन्ना हुआ. सोचा ये टैक्सीवाला अपना कुछ रोना रोएगा और शायद पैसे मांगेगा.

ग़लती मेरी भी नहीं थी. बचपन में एक कहानी पढ़ी थी बाबा भारती और डाकू खड्गसिंह की. डाकू ग़रीब के वेष में आकर बाबा भारती का घोड़ा छीन ले जाता है. बाबा भारती ने उसे रोककर कहा था- ये बात किसी से कहना नहीं वरना ग़रीब की बात का आगे से कोई यकीन नहीं करेगा.

और हुआ वैसा ही है. ग़रीबी और मजबूरी की कहानियों पर भरोसा करना अब थोड़ा मुश्किल हो गया है.

ख़ैर मैने ड्राइवर से पूछा, बताएं क्या कर सकता हूं आपके लिए. कहने लगा मेरी बहन कराची में है, उम्र केवल तीस साल और उसके दोनों गुर्दे ख़राब हो चुके हैं, आईसीयू में भर्ती है, कल एक बड़ा ऑपरेशन होना है,मैं तो हर मस्जिद में दुआ मांग चुका हूं, अगर हो सके तो आप अपने भगवान से उसके लिए दुआ कीजिएगा.शायद वो सुन ले.

 ज़माने के बाद अपने लिए नहीं किसी अजनबी के लिए भगवान के सामने हाथ फैलाया. ज़िंदगी की भागदौड़ में फिर उसे फ़ोन करके पूछ नहीं सका कि ऑपरेशन कैसा रहा लेकिन कई बार उसका ख़याल आया. वो भी औरों की तरह अमेरिकन ड्रीम की तलाश में यहां आया है, लेकिन ये ऐसा सपना है जो थोड़ी खुशियां तो देता है लेकिन बदले में बहुत कुछ लेता भी है.

कहते कहते उसकी आवाज़ भर्रा गई, मुझे अपने आप पर आश्चर्य हुआ क्योंकि आँखे मेरी भी नम हो गईं. मैने पूछा आप गए क्यों नहीं तो कहने लगा यहाँ हूं तो कम से कम ऑपरेशन के लिए पैसे तो भेज रहा हूं लेकिन दिल बहुत करता है कि आज उसके पास जाने को.

दफ़्तर आ गया था, टैक्सी रूकी लेकिन उसने पैसे लेने से इंकार किया, मैने ज़बरदस्ती पैसे थमाए, उसका फ़ोन नंबर लिया और टैक्सी से उतर गया.

अगली सुबह, शायद ज़माने के बाद अपने लिए नहीं किसी अजनबी के लिए भगवान के सामने हाथ फैलाया. ज़िंदगी की भागदौड़ में फिर उसे फ़ोन करके पूछ नहीं सका कि ऑपरेशन कैसा रहा लेकिन कई बार उसका ख़याल आया.

वो भी औरों की तरह अमेरिकन ड्रीम की तलाश में यहां आया है, लेकिन ये ऐसा सपना है जो थोड़ी खुशियां तो देता है लेकिन बदले में बहुत कुछ लेता भी है.

सपनों की दुनिया

सपने भी कितने अजीब होते हैं. झोपड़ी के बाहर खेल रहे एक छोटे से बच्चे को रूपए का सिक्का मिलता है और वो चमकीले रैपर में लिपटे चॉकलेटों का अंबार खरीदने का सपना देख लेता है. बनिए की दुकान पर पता चलता है उतने पैसे में उसे एक चॉकलेट भी नहीं मिलेगा.

सपना छोटा सा था लेकिन टूटने का दुख होता है. और जब सपना बड़ा हो तो दुख कहीं ज़्यादा होता है.

हिलेरी क्लिंटन ने जब अपनी ही पार्टी से राष्ट्रपति पद की टिकट की उम्मीदवारी के लिए हाथ बढ़ाया तो शायद ही किसी ने सोचा था कि उन्हें ये नहीं भी मिल सकता है.

लेकिन डेढ़ साल की मशक्कत के बाद जब तीन जून को वो सपना टूटा तो मुझे लगा शायद अब चेहरे पर मायूसी और टूटन दिखेगी.

लेकिन कहां? उन्होंने कहा मैं हारी ज़रूर हूँ लेकिन शीशे की जो छत महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकती है इस देश में उस छत में मैने एक करोड़ अस्सी लाख दरारें पैदा कर दी है.

पर ज़रा सोचिए क्या भारत में राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी से कुछ मांगे और उन्हें नहीं मिले, पाकिस्तान में बिलावल भुट्टो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का कोई ओहदा चाहें और उन्हें मुश्किल हो ऐसा हो सकता है.

और यहां हिलेरी क्लिंटन, पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन, न्यूयॉर्क जैसे प्रभावशाली राज्य की सीनेटर हिलेरी क्लिंटन को दर-दर की ठोकरें खाने के बाद भी वो नहीं मिला जो वो चाहती थीं. इसे अमरीकी लोकतंत्र की ख़ासियत कहें या भारत- पाकिस्तान के लोकतंत्र की कमज़ोरी.

ओबामा का जादू

न्यूज़वीक पत्रिका के संपादक फ़रीद ज़कारिया इसे एक कमज़ोरी मानते हैं.

उनका कहना है,`` भारत में अब भी हम परिवार, जात, धर्म और क्षेत्र के नाम पर वोट देते हैं. ज़रूरत है पार्टियों के अंदर ज़मीनी स्तर पर चुनाव की.''

वैसे मैंने हिलेरी क्लिंटन का सपना टूटते देखा तो एक दूसरे और बड़े सपने को साकार होते हुए भी देखा--साठ की दशक में कालों के समान अधिकार के लिए लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग के सपने को.

लेकिन एक अफ़्रीकी अमरीकी राष्ट्रपति की कुर्सी के इतने करीब पहुंच सकता है ये शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा.

बराक ओबामा का जादू इन दिनों अमरीका पर सर चढ़कर बोल रहा है लेकिन बराक ओबामा और व्हाइट हाउस के बीच कोई खड़ा है तो वो हैं रिपबलिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन.

 वैसे मैंने हिलेरी क्लिंटन का सपना टूटते देखा तो एक दूसरे और बड़े सपने को साकार होते हुए भी देखा--साठ की दशक में कालों के समान अधिकार के लिए लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग के सपने को. लेकिन एक अफ़्रीकी अमरीकी राष्ट्रपति की कुर्सी के इतने करीब पहुंच सकता है ये शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा.

बराक ओबामा का जादू इन दिनों अमरीका पर सर चढ़कर बोल रहा है लेकिन बराक ओबामा और व्हाइट हाउस के बीच कोई खड़ा है तो वो हैं रिपबलिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन.

बहुत ज़बरदस्त उम्मीदवार हैं लेकिन उन्हें जब देखता हूं तो मुझे याद आ जाती हैं विक्रम और बेताल की कहानियां.

जिस तरह विक्रम को हमेशा अपने कंधे पर बेताल को लादे रहना पड़ता था वैसा ही कुछ हाल है जॉन मैकेन का. ओबामा के ख़िलाफ़ इस कांटे की रेस में उन्हें राष्ट्रपति बुश को लगातार अपने कंधे पर ढोते हुए भागना पड़ रहा है. बुश की हर असफल नीति उनकी मुश्किलें बढ़ा रही है और ये बोझ हर दिन बढ़ता ही जा रहा है.

पहले ग्वांतानामो के क़ैदियों को और अधिकार देने का फ़ैसला आया जिसकी शायद न चाहते हुए भी मैकेन को आलोचना करनी पड़ी क्योंकि बुश उसके ख़िलाफ़ रहे हैं, और फिर एक और झटका लगा जब कैलिफ़ोर्निया में समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मंज़ूरी मिल गई.

रिपब्लिकन पार्टी के लिए तो एक बड़ा धक्का है ये लेकिन फ़ैसले के आते ही कैलिफ़ोर्निया की अदालतों के बाहर रामलाल- शामलाल की जोड़ियां, सुनीता- विनीता की जोड़ियां शादी के बंधन में बंधने के लिए टूट पड़ीं.

रूढ़िवादी अमरीका ने इसके ख़िलाफ़ नारे भी लगाए. अमेरिका इज़ डूम्ड, पापियों का नाश हो, इस तरह के पोस्टरों से सैन फ्रांसिस्को पटा हुआ था.

लेकिन इन सबके बावजूद शादी करनेवालों की भीड़ बढ़ती जा रही है क्योंकि डर इस बात का है कि नवंबर में ये फ़ैसला बदला भी जा सकता है.

फ़िलहाल, राष्ट्रपति बुश की मुसीबतें कम होती नहीं दिख रहीं. अर्थव्यवस्था नीचे जा रही है, तेल की कीमतें उपर, लोग मकानों के किश्त नहीं चुका पा रहे हैं, कहीं बाढ़ आई हुई है कहीं आग लग रही है,

इराक़ में थोड़ा ठहराव नज़र आ रहा है तो अफ़गानिस्तान हाथ से निकलता नज़र आ रहा है. यूरोप जाते हैं तो लोग उनसे ज़्यादा मैकेन और ओबामा की बातें करते हैं.

हाथी मेरे साथी

वैसे ये समय था देश को अपनी कामयाबियाँ गिनाते हुए व्हाइट हाउस में पाँव फैलाकर आराम से बैठने का, और जब पिछले हफ़्ते व्हाउट हाउस से संगीत के स्वर सुनाई दे रहे थे तो लगा भी कि शायद वैसा ही कुछ हो भी रहा है.

बात दरअसल ये थी कि जून का महीना यहां ब्लैक म्यूज़िक मंथ के रूप में मनाया जाता है. जगह- जगह काले अफ़्रीकी अमरीकी कलाकारों का सम्मान हो रहा है और व्हाइट हाउस ने भी कई काले कलाकारों को आमंत्रित किया था. और उस दिन का थीम था गॉस्पेल म्यूज़िक.

इस तरह के संगीत की शुरूआत की थी काले ग़ुलामों ने पहले एक दूसरे तक संदेश भेजने के लिए और फिर भगवान की प्रार्थना के लिए कि वो उनके दुःख को कम कर सकें.

राष्ट्रपति बुश को भी शायद कुछ ऐसी ही कोशिशें करनी होंगी अपनी परेशानियां कम करने के लिए. डांस तो फिर भी थोड़ा बहुत वो कर लेते हैं, गाते कैसा हैं ये मुझे नहीं पता.

डांस की बात पर एक और बात याद आई. मनन शाह की शादी की बात.

जिस दिन उनकी शादी हुई, वाशिंगटन का ट्रैफ़िक कुछ देर के लिए रूक सा गया. लोग कतार लगा कर खड़े हो गए.

इसलिए नहीं की डांस बहुत अच्छा हो रहा था बल्कि इसलिए कि वाशिंगटन की सड़क पर था एक सजा संवरा हाथी और हाथी पर सवार होकर मनन शाह निकाल रहे थे अपनी बरात.

मैने उनके पिता सुरेश शाह से पूछा कि अमरीका में हाथी पर बरात. क्या सूझी उन्हें? उन्होंने कहा और कुछ नहीं बेटे का बचपन का सपना पूरा कर रहा था.

 कभी कभी लगता है एक ये अमरीका है जो अपनी ज़मीन पर अलग अलग रीतियों, अलग अलग संस्कृतियों को गले लगाने में नहीं झिझकता. वहीं एक दूसरा अमरीका है जिसे दुनिया के कई हिस्सों में हर मुसीबत की जड़ माना जाता है. शायद अमरीकी सॉफ़्ट पॉवर और हार्ड पावर के बीच तालमेल की कमी रह गई है

कहते हैं,``बचपन में हाथी मेरे साथी उसकी सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से थी. और शादी के वक्त उसने कहा कि मेरी ज़िदगी का एक बड़ा सपना रहा है हाथी पर चढ़कर बरात निकालने का...तो मैने भी सोचा चलो इसे पूरा किया जाए.''

ग़ौर करने वाली बात है कि हाथी मेरे साथी देखते हुए मनन शाह ने हाथी पर जीवनसाथी लाने का इरादा कर लिया और वो पूरा भी हो गया. दरअसल भारतीय शादियां यहां इतनी धूमधाम से हो रही हैं कि उनसे जुड़ी एक पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो गई है.

यहां कारों की बिजनेस से जुड़े कुमार सिंह ने हाल ही में अपने बेटे की शादी की है. कहते है दस साल पहले मंडप बनवाना भी मुश्किल होता था, अब आप जो सोच लें वो संभव है.

कहते हैं,``कोई बड़ी बात नहीं कि आनेवाले दिनों में हमें शादियों में बंदूकों से हवाई फ़ायर करने की भी इजाज़त मिल जाए.''

कभी कभी लगता है एक ये अमरीका है जो अपनी ज़मीन पर अलग अलग रीतियों, अलग अलग संस्कृतियों को गले लगाने में नहीं झिझकता.वहीं एक दूसरा अमरीका है जिसे दुनिया के कई हिस्सों में हर मुसीबत की जड़ माना जाता है.

शायद अमरीकी सॉफ़्ट पॉवर और हार्ड पावर के बीच तालमेल की कमी रह गई है.

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