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प्यार और अपनेपन का शहर अबुजा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
होटल के गलियारों में नाइजीरियाई वेटर ने जब मुस्कुरा कर पूछा- 'गुड मार्निंग हाउ वाज़ योर नाइट' (सुप्रभात! रात कैसी रही? ). एक पल के लिए मुझे समझ में ये नही आया कि आख़िर इतने निजी सवाल का क्या मतलब है. भला हो बालीवुड का जिसने 'रात की हर बात' के प्रति हमे काफ़ी संवेदनशील बना दिया है. इससे पहले कि मैं अबुजा यात्रा से पहले अपने पुरूष और महिला मित्रो की बिन माँगी सलाहों का ध्यान करती, पाया कि उस वेटर ने फिर वही सवाल पास से गुज़र रहे दूसरे स्त्री और पुरुषों से भी किया. चलिए मामला फ़्लर्ट का नहीं है. दरअसल यहाँ की संस्कृति का हिस्सा है अजनबियों को भी दुआ सलाम करना, परिवार और उनके स्वास्थ्य के बारे मे पूछना. सुबह मिलो तो रात का ज़िक्र करना और शाम में मिलो तो दिन भर के बारे मे पूछना. मुझे ये रिवाज बहुत भाने लगा है. यहाँ वर्ष 1972 से रह रहे डॉक्टर शबीबुल हसन आधे नाइजीरियाई है और आधे भारतीय. फ़र्राटे से हिंदी तो बोलते ही है फ़र्राटे से नाइजीरिया की सबसे प्रचलित भाषा हाउसा भी बोलते है. 'नो प्रॉब्लम' उनका मानना है कि अजनबियों से दुआ सलाम का इनका ये रिवाज भारतीय संस्कृति से अलग है. कई बार उनके नाइजीरियाई दोस्त ये शिकायत करते हैं कि भारत के लोग मिलने के साथ केवल काम की बात करने लगते है. तो अब ख्याल रहे... यहाँ की आम बोल-चाल की भाषा में एक और शब्द है जो हरेक की ज़बान पर चढ़ा होता है... नो प्रॉब्लम. 'नो प्रॉब्लम' बोलने से क्या समस्या होगी नहीं, लेकिन जब होती है तो ज़रा हल्की-फुल्की ही लगती होगी. यहाँ मुझे टैक्सी और निजी वाहनों को छोड़ कोई दूसरा वाहन नही दिखा है. कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं. इसीलिए यहाँ सेकेंड हैंड कार का ज़बरदस्त बाज़ार है.
टैक्सी का चलन बहुत नहीं है. कुछ पंजीकृत हैं बाकी लोग पार्ट टाईम के रूप में अपनी गाड़ियों को ही टैक्सी के रूप मे चलाते हैं. इनको 'काबु काबु' के रूप मे जाना जाता है. और हाँ, मोबाइल का बाज़ार तो ज़बर्दस्त है ही बाकी दुनिया की तरह, लेकिन नेटवर्क की इतनी समस्या है कि हर आदमी यहाँ दो मोबाइल रखता है. एक आप हैं कि एक ही में परेशान हैं... संपन्न भारतीय यहाँ की आबादी 14 करोड़ है. इनमें से तीस हज़ार से ज़्यादा भारतीय नहीं हैं. अबुजा मे तीन सौ से ज़्यादा भारतीय परिवार नहीं हैं. यहाँ जिन भारतीयों के घरों मे मेरा जाना हुआ उनसे पता चला कि भारतीय यहाँ काफी संपन्न हैं. उनके घरो के ड्राइवर, नौकर, खाना पकाने वाले सभी स्थानीय काले होते हैं. यहाँ रहते हुए भारतीय कितना इस समाज के हो पाए हैं इस पर कभी और बात होगी. पूरी दुनिया में जहाँ शहरी महिलाओ मे 'साइज़ ज़ीरो' का क्रेज़ बढ़ता जा रहा है अबुजा मे महिलाएँ इसकी दौड़ से अलग दिखीं. सच पूछिए तो भारत में आप जितना वज़न को लेकर परेशान होने लगते हैं वहीं यहाँ आकर आपको लगता है नहीं जी अभी तो हमारे खाने-पीने के दिन हैं. बात खाने की हुई तो दुखड़ा रोते चले कि आप यहाँ ज़्यादा दिन टिके तो खाना तो रहने दें बस पीने पर गुज़ारा करना होगा. भारतीय खान-पान से समानता तीखेपन और चावल को लेकर ज़रूर है. पर कहानी वही ख़त्म हो जाती है. हमारे साथ ये भी तो समस्या है कि जहाँ जाए अपने स्वाद को लिए चलते हैं. अंत मे दो टूक बात बस इतनी कि भले ही कम खा-पी कर गुज़ारा करना पड़े पर ये जगह आपको प्यार और अपनापन बहुत देती है. भागते हुए बड़े शहरों से इस मामले मे अबुजा अलग लगा. |
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