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जलवायु परिवर्तन से 'अफ़्रीका में संकट' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक रिपोर्ट के अनुसार अफ़्रीका में जलवायु परिवर्तन लोगों को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है और अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो ग़रीबी को ख़त्म करने के लिए उठाए गए कदम बेकार हो जाएँगे. पर्यावरण के लिए काम करने वाले समूहों और ब्रिटेन की सहायता एजेंसियों की रिपोर्ट ‘स्मोक-2’ में कहा गया है कि सूखे की स्थिति बदतर होने के साथ ही जलवायु परिवर्तन को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ती जा रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से लोगों के सामने भोजन की कमी का बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है. इससे निपटने के लिए विकास का ऐसा मॉडल बनाने की वकालत की गई है जिस पर जलवायु परिवर्तन का असर न पड़े. साथ ही जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए वातावरण में होने वाले उत्सर्जन में कमी लाने की भी सलाह दी गई है. नया ख़तरा हालांकि अफ़्रीका में जलवायु हमेशा ही परिवर्तनशील रहा है लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान और अनुभव नए और गंभीर ख़तरे के संकेत दे रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी, पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी अफ़्रीका के सूखे क्षेत्र और भी सूखे होते जा रहे हैं. जबकि भूमध्यवर्ती क्षेत्र और दक्षिणी अफ्रीका के क्षेत्र में पानी बढ़ता जा रहा है. सौ साल पहले के मुक़ाबले आज महादेश औसतन 0.5 सें. अधिक गर्म है लेकिन कुछ क्षेत्रों में तापमान बहुत अधिक हुआ है. केन्या के कुछ हिस्सों में 20 साल पहले के मुक़ाबले आज तापमान 3.5 सें. अधिक है. न्यू इकोनॉमिक फांउडेशन के एंड्रयू सिम्मस का कहना है, ‘‘ग्लोबल वार्मिंग से ऐसी समस्याएं निश्चित रूप से और बढ़ेंगी जिससे अफ़्रीका पहले से ही जूझ रहा है.’’ उनका कहना है, ‘‘पिछले ही साल सहारा के क्षेत्रों में ढाई करोड़ लोगों के सामने भोजन का संकट पैदा हो गया था.’’ वे कहते हैं, ‘‘ ग्लोबल वार्मिंग का मतलब है कि सूखे क्षेत्रों में सूखा बढ़ता जाएगा, जबकि पानी वाले क्षेत्रों में पानी बढ़ता जाएगा.’’ एंड्रयू सिम्मस आगे कहते हैं कि विडंबना ये है कि ग्लोबल वार्मिंग में अफ्रीका की कोई भूमिका नहीं है. यह अमीर और औद्योगिक रूप से विकसित देशों की देन है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बेहतर प्रबंधन से त्रासदी के ख़तरे को कम किया जा सकता है. इसके लिए कृषि के विकास पर ध्यान देना होगा जिससे जलवायु परिवर्तन की गति को नियंत्रित किया ज सके. | इससे जुड़ी ख़बरें अफ़ग़ानिस्तान में खाद्य संकट की आशंका22 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस क्योटो संधि के लक्ष्यों से यूरोप पीछे27 दिसंबर, 2005 | विज्ञान धुएँ ने ही बढ़ाया पृथ्वी का तापमान18 फ़रवरी, 2005 | विज्ञान अमरीका नहीं मानेगा क्योटो संधि को08 दिसंबर, 2004 | पहला पन्ना मौसम की मार आर्थिक विकास पर20 अक्तूबर, 2004 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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