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मौसम की मार आर्थिक विकास पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पर्यावरण और विकास से जुड़े कुछ संगठनों ने चेतावनी दी है कि मौसम में हो रहे परिवर्तन की वजह से ग़रीब देशों के आर्थिक विकास में मुश्किलें सामने आ रही हैं. एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर के बढ़ते तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से दुनिया के विकास के लिए रखे गए लक्ष्य शायद पूरे नहीं हो सकें. चार साल पहले लगभग 200 देशों के नेताओं ने 'मिलेनियम गोल्स' यानी लक्ष्यों पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें आर्थिक और सामाजिक विकास से जुड़े मुद्दों को रखा गया था. ग़रीबी और भूख को वर्ष 2015 तक पचास प्रतिशत कम करने का लक्ष्य रखा गया था, स्वच्छ पानी और साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था बढ़ाने और बीमारियों को कम से कम करने का भी लक्ष्य था.
मगर संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के सबसे ग़रीब क्षेत्र यानी सहारा के निकट के अफ़्रीकी देशों में इस दिशा में काफ़ी धीमा काम हो रहा है और 18 संगठनों की इस नई रिपोर्ट के अनुसार जलवायु में हो रहा परिवर्तन इन लक्ष्यों को पाने में सबसे बड़ी मुश्किल साबित हो रहा है. न्यू इकॉनॉमिक फ़ाउंडेशन के प्रमुख लेखक ऐंड्रयू सिम्स का कहना है, “आप देखेंगे कि कृषि के कामों में किस तरह लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को भूख का सामना करना होगा." वे मिसाल देते हैं, "इन्हीं गर्मियों में दो महीने के भीतर ही बांग्लादेश में आई बाढ़ की वजह से उसके सकल घरेलू उत्पाद का पाँच प्रतिशत नुक़सान हुआ और ये काफ़ी बड़ी राशि है.” एक अनुमान के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं की वजह से पिछले साल दुनिया में 60 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ, ये आपदाएँ मौसम में आए ज़बरदस्त परिवर्तन की वजह से आईं. ग्लोबल वॉर्मिंग के कंप्यूटर मॉडल दिखाते हैं कि इस तरह की घटनाएँ अब बढ़ेंगी ही जिससे आर्थिक संकट भी बढ़ेगा. रिपोर्ट के अनुसार इससे बचने का उपाय यही है कि ऊर्जा के परंपरागत साधनों का इस्तेमाल कम किया जाए और पश्चिमी देश लगातार विकासशील देशों को मदद दें वरना तय किए गए लक्ष्यों को पूरा करना काफ़ी मुश्किल होगा. |
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