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खाने की बढ़ती लागत पर चेतावनी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ी हुई क़ीमतें कुछ और समय तक टिकी रह सकती हैं क्योंकि विकासशील देशों से माँग बढ़ रही है और उत्पादन की लागत भी बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र संस्था खाद्य और कृषि संगठन ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की जो क़ीमतें बढ़ी हैं वो पिछले सभी रिकॉर्ड से कहीं ज़्यादा थीं और उसकी कुछ वजह ये भी थी कि ख़राब मौसम की वजह से बहुत सी फ़सलें तबाह हो गई थीं. संगठन ने यह भी कहा है कि हालाँकि निकट भविष्य में महंगाई में कुछ कमी तो आएगी लेकिन जैव-ईंधन की बढ़ती माँग की वजह से भविष्य में लागत भी बढ़ेगी. विश्व खाद्य संगठन ने यह भी कहा है कि ज़रूरी चीज़ों के बाज़ार में महंगाई की जो यह स्थिति बनी है उसके लिए वो लोग भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं जिन्होंने अटकलों का बाज़ार गर्म कर दिया. बढ़ते बिल विश्व खाद्य संगठन की वार्षिक अनुमान रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017 तक गेहूँ की क़ीमतों में 60 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है और वनस्पति तेल उस समय तक लगभग 80 प्रतिशत महंगा हो सकता है. दुनिया भर में वर्ष 2005 और 2007 के बीच गेहूँ, मक्का और तिलहन फ़सलों के दाम लगभग दोगुने हो चुके हैं. संगठन ने हालाँकि इन चीज़ों क़ीमतों में कुछ कमी होने की संभावना जताई है लेकिन यह कमी हाल के समय में हुई महंगाई के मुक़ाबले बहुत धीमी होगी.
इस महंगाई के लिए संगठन ने ख़राब मौसम, माँग और आपूर्ति में अंतर को तो ज़िम्मेदार बताया ही है, साथ ही यह भी कहा है कि अटकलों की वजह से भी महंगाई बढ़ी है. विश्व खाद्य संगठन ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि बहुत से किसान अब खाद्य पदार्थों वाली फ़सलों ना उगाकर नक़दी फ़सलें या जैव ईंधन वाली फ़सलें उगाने लगे हैं. संगठन की रिपोर्ट लिखने वालों में शामिल मैरिट क्लफ़ का कहना था, "खेतीबाड़ी में इस समय जैव-ईंधन वाली फ़सलें बहुत लोकप्रिय हो रही हैं और उन्हीं की वजह से क़ीमतें भी बढ़ रही हैं. हम इन हालात पर बहुत चिंतित हैं, ख़ासतौर से जैव-ईंधन नीति पर. अमरीका ने अपने किसानों को एथानॉल के उत्पादन के लिए जो रियायतें दी हैं, उसकी वजह से बाज़ार की हालत बिगड़ी है." रिपोर्ट में भविष्य के बारे में आकलन पेश करते हुए कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से भी फ़सलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है और उससे अंततः क़ीमतें और ऊपर जाएंगी. संगठन ने चेतावनी दी है कि बढ़ती क़ीमतों की वजह से सबसे ज़्यादा असर जिस तबके पर पड़ेगा वो ग़रीब लोगों का होगा क्योंकि यह तबका अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा अपना पेट भरने पर ख़र्च करता है. मेरिट क्लफ़ ने कहा, "हम ग़रीब लोगों की स्थिति के बारे में बहुत चिंतित हैं और हालात को देखते हुए ऐसी बड़ी संभावना है कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ेगी जिन्हें स्वास्थ्य की नज़र से भरपेट खाना नहीं मिल पाता है." विश्व खाद्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि हाल की महंगाई की वजह से कुछ विकासशील देशों में कुछ लोगों को अपनी कुल आमदनी का आधा हिस्सा सिर्फ़ खाने-पीने की चीज़ों पर ख़र्च करने के लिए मजबूर कर दिया है, ख़ासतौर से ऐसे देशों में जिन्हें खाने-पीने की चीज़ों का आयात करना पड़ता है. बढ़ती क़ीमतों की वजह से कुछ देशों में प्रदर्शन हुए हैं, दंगे फैले हैं और कुछ देशों में तो लोगों ने घबराहट में आकर सामान का भंडार करना शुरू कर दिया है. | इससे जुड़ी ख़बरें सऊदी अरब का संयुक्त राष्ट्र को 'महादान'24 मई, 2008 | पहला पन्ना अनाज आयात एक खरब डॉलर का22 मई, 2008 | कारोबार तेल 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचा22 मई, 2008 | कारोबार महँगाई फिर रिकॉर्ड स्तर पर पहुँची16 मई, 2008 | कारोबार खाद्यान्न संकट के लिए मोटापा ज़िम्मेदार!16 मई, 2008 | विज्ञान रुक नहीं रही है महँगाई09 मई, 2008 | कारोबार महंगाई संकट पर एडीबी की चेतावनी03 मई, 2008 | कारोबार भारत में महँगाई रिकॉर्ड स्तर पर02 मई, 2008 | कारोबार इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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