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इराक़ी शरणार्थियों को सहायता की गुहार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जॉर्डन में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इराक़ी शरणार्थियों के मुद्दे पर चिंता जताई गई है और अंतरराष्ट्रीय सहायता की गुहार लगाई गई है. इराक़ी विदेश उप मंत्री मोहम्मद हमूद ने बताया कि पड़ोसी देशों में क़रीब दो अरब इराक़ी शरणार्थी रह रहे हैं. हज़ारों की संख्या में इराक़ी शरणार्थियों को अपने यहाँ रखने वाले इन देशों ने अपना बोझ कम करने के लिए सहायता की अपील की है. इराक़ी मंत्री ने कहा कि इन शरणार्थियों के दस्तावेज़ रखने, उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने और शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए सहायता की आवश्यकता है. सम्मेलन में शामिल जॉर्डन के प्रतिनिधियों ने सुरक्षा का मामला भी उठाया. उन्होंने कहा कि शरणार्थी के रूप में आने वाले लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच होनी चाहिए. जॉर्डन के साथ-साथ सीरिया भी इराक़ी शरणार्थियों की समस्या से जूझ रहा है. इस सम्मेलन में मिस्र, अरब लीग, संयुक्त राष्ट्र और संयुक्त राष्ट्र राहत संगठनों के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि हर महीने क़रीब 50 हज़ार इराक़ी अपना देश छोड़ कर जा रहे हैं. इनमें से ज़्यादातर जॉर्डन और सीरिया में शरण ले रहे हैं. ख़तरा संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पलायन के कारण क्षेत्रीय स्थिरता पर ख़तरा पैदा हो गया है. एजेंसी का कहना है कि 1948 के बाद से ये मध्य पूर्व की सबसे बड़ी समस्या बन गई है. वर्ष 1948 में इसराइल के गठन के बाद हज़ारों फ़लस्तीनी इलाक़ा छोड़कर चले गए थे. सम्मेलन को संबोधित करते हुए इराक़ी विदेश मंत्रालय के महासचिव मोहम्मद हज हमौद ने कहा, "हमें अपने मानवीय कर्तव्यों के तहत ये देखना चाहिए कि समस्या की गंभीरता क्या है और यह स्वीकार करना चाहिए कि वास्तव में यह एक मानवीय संकट है." उन्होंने यह भी कहा कि इराक़ी शरणार्थियों को रोकने के लिए पड़ोसी देश अब कड़े नियम लगा रहे हैं इस कारण सीमा पर इन लोगों के साथ दुर्व्यवहार भी हो रहा है. अपील ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं जब एक परिवार के कुछ लोग तो दूसरे देश में चले गए, लेकिन बाक़ी सदस्य इराक़ में ही हैं. ऐसी सी हैं जॉर्डन में रहने वाली नजला अब्दा करीम सालेह. वे अपने बेटे और बेटी के साथ इराक़ छोड़कर आ गईं. उनकी एक बेटी जातीय हिंसा में मारी गई. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से सहायता की अपील की और कहा कि उनके पोते-पोतियों को भी अम्मान लाया जाए. रोते हुए उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमारा घर बर्बाद हो गया. हम बर्बाद हो गए. मेरी बेटी मारी गई, मेरा बेटा मर गया. मेरे परिवार की रक्षा करो." शरणार्थियों की समस्या पर बुलाए गए सम्मेलन में जॉर्डन और सीरिया यह भरोसा चाहते थे कि या तो इराक़ी शरणार्थी अपने देश लौट जाएँ या फिर उन्हें कहीं और बसाया जाए. जॉर्डन और सीरिया के अलावा मिस्र और लेबनान में भी हज़ारों शरणार्थी रह रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ने इन शरणार्थियों के लिए वार्षिक सहायता दोगुनी करने की अपील की है. |
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