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जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्ट का इंतज़ार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन से जुड़े तमाम विषयों पर ब्रसेल्स में वैज्ञानिकों और सरकारी अधिकारियों के बीच गंभीर मंथन शुरू हो गया है. इसी बातचीत के आधार पर आज एक रिपोर्ट जारी की जाएगी. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र की ओर से गठित विभिन्न देशों की साझा समिति (आईपीसीसी) तैयार कर रही है. ऐसी संभावना जताई जा रही है कि इस रिपोर्ट में दुनिया के ग़रीब इलाक़ों में रहने वाले करोड़ों लोगों पर मौसम परिवर्तन के ख़तरनाक असर के बारे में चेतावनी जारी की जाएगी. इसी बीच अमरीका, चीन और भारत के अधिकारी संभावित रिपोर्ट के कुछ अंशों की विश्वसनीयता पर वैज्ञानिकों के साथ मंत्रणा कर रहे हैं. प्रभाव आईपीसीसी के चैयरमैन राजेंद्र पचौरी का कहना है कि पिछले पाँच-छह वर्षों में जिन परियोजनाओं पर काम हुए हैं, उससे मौसम परिवर्तन के असर के बारे में ठोस सबूत मिले हैं. उन्होंने कहा, "अब हम मौसम परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए चाहे जो प्रयास करें, तापमान का बढ़ना तय है और दुनिया को इसके अनुरुप अपने को ढालना होगा." वो कहते हैं, "अब अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को कुछ करना होगा. मैं मानता हूँ कि विकसित देशों को प्राकृतिक आपदाओं के बाद राहत और पुनर्वास पर खर्च करने के बजाए मूल समस्या से निपटने के लिए उचित सहायता देना चाहिए. यह उनके लिए ज़्यादा सस्ता पड़ेगा." संभावित रिपोर्ट ब्रसेल्स में मौजूद बीबीसी संवाददाता रिचर्ड ब्लैक का कहना है कि संभावित रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र होगा कि जलवायु परिवर्तन ने प्रकृति पर गहरा असर डाला है. बीबीसी ने संभावित रिपोर्ट का प्रारूप (ड्राफ्ट) देखा है जिसमें कहा गया है कि मौसम परिवर्तन के सभी प्रभावों से निपटना समाज के लिए मुश्किल साबित होगा. रिपोर्ट में ये बात सामने आ सकती है कि 1990 के बाद वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हुई है. इससे लगभग एक-तिहाई जैव प्रजातियों के लुप्त होने का ख़तरा पैदा हो गया है. एक अरब से अधिक की आबादी पीने के पानी के लिए तरस सकते हैं. इसका मूल कारण हिमनदों (ग्लेशियर) पर ज़मी बर्फ़ का पिघलना है. ये हिमनद पानी के कुदरती स्रोत हैं. |
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