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मुलाक़ात एक 'ख़तरनाक अपराधी' से | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले साल रविवार की एक शाम बीबीसी के दफ़्तर यानी बुश हाउस के रिसेप्शन में मेरी टाइलर मेरा इंतज़ार कर रही थीं. मोटे लेंसों वाला चश्मा, छोटा क़द और चेहरे पर उम्र की लकीरें. इस दुबली-पतली अँग्रेज़ महिला को देखकर ये कल्पना करना भी मुश्किल था कि किसी ज़माने में वो भारत सरकार की नज़र में एक ख़तरनाक अपराधी रही होंगी. मेरी टाइलर का नाम अब शायद ही किसी को याद हो. लंदन ही नहीं भारत में भी उनके बारे में जानने वाले कुछ गिने-चुने लोग ही होंगे. लेकिन क़रीब पैंतीस साल पहले पश्चिम बंगाल और बिहार की सीमा पर आदिवासी इलाक़े में उन्हें जब पुलिस ने गिरफ़्तार किया, तब लंदन के अख़बार इन ख़बरों से रंग गए थे. मेरी टाइलर की उम्र तब कोई तीस साल रही होगी. उन दिनों कोलकाता में नक्सलवादी आंदोलन उफ़ान पर था और मेरी ने जिस बंगाली युवक से शादी की उसे पुलिस नक्सलवादी मानती थी. इसीलिए बिना मुक़दमे की सुनवाई के मेरी ने आपातकाल के 19 महीने मिलाकर पूरे पाँच साल भारतीय जेलों में काटे. अपनी जेल डायरी को बाद में उन्होंने एक किताब की शक्ल में प्रकाशित करवाया. 'भारतीय जेलों में पाँच साल' नाम की ये किताब अब भी भारत में जेलों की स्थिति को समझने के लिए संदर्भ ग्रंथ के तौर पर इस्तेमाल की जाती है. अस्सी के दशक में किताब पढ़ते हुए मुझे सिर्फ़ इतना पता लगा कि काफ़ी लिखा-पढ़ी और कूटनीतिक दबाव के बाद भारत सरकार ने उन्हें रिहा करके जबरन लंदन भेज दिया. लेकिन तब ये सोचा भी नहीं था कि कभी उनसे मुलाक़ात होगी. पहली बार 1999 में इंग्लैंड आने के बाद मैंने उन्हें तलाश करने का सिलसिला शुरू किया. दर्जनों लोगों को ई-मेल, टेलीफ़ोन करने के बाद आख़िरकार पिछले साल उनसे मुलाक़ात हो पाई. सामाजिक जीवन में मेरी टाइलर अब भी सक्रिय हैं. इराक़ पर हमले के ख़िलाफ़ लंदन में हुए विशाल प्रदर्शन में उन्होंने हिस्सेदारी की थी. पर अब वो विगत के बारे में कम ही बात करती हैं. वो कहती हैं, "जो मैंने अपनी किताब में लिखा है, उससे ज़्यादा मेरे पास कहने को कुछ नहीं है. अलबत्ता, वो इतिहास मेरी अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा है जिसे मैं ख़ुद से कभी अलग नहीं कर पाऊँगी." **************************************************************** माधुरी फ़िदा हुसैन क़िस्सा थोड़ा पुराना ज़रूर है लेकिन उतना पुराना भी नहीं जितना इस क़िस्से का प्रमुख पात्र. क़िस्से के प्रमुख पात्र की उम्र है तिरानवे वर्ष मगर क़िस्सा सिर्फ़ दो या तीन महीने पुराना ही है.
झक सफ़ेद दाढ़ी, निश्छल मुस्कान, हाथ में लंबा सा ब्रश और पैरों में जूते नदारद. फिर भी आख़िर क्या था इस व्यक्ति में कि उस शाम पश्चिमी लंदन की एक पार्टी में मौजूद सबसे ख़ूबसूरत लड़कियाँ और महिलाएँ उस आदमी के ऑटोग्राफ़ लेने की होड़ में लगी हुई थीं. वो भी क़लम से नहीं बल्कि अपने लिप्स्टिक से. अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है कि ख़ुद से चौथाई उम्र की कन्याओं से घिरे इस व्यक्ति का नाम है मक़बूल फ़िदा हुसैन. ऐसा हो नहीं सकता कि हुसैन हों और माधुरी दीक्षित का ज़िक्र न हो. माधुरी का नाम सुनते ही हुसैन की आँखों में वैसी चमक आती है जैसी पहली बार गवर्नमेंट गर्ल्स इंटर कॉलेज के बाहर इंतज़ार में खड़े रहने वाले किशोर की आँखों में. बातों ही बातों में मैंने पूछ डाला कि हुसैन साहब माधुरी जी से संपर्क अब भी बना हुआ है क्या? तपाक से हुसैन साहब बोले, "बिलकुल, क्यों नहीं? उनका फ़ोन आता रहता है." और फिर वही निश्छल मुस्कान !! आसपास खड़े लोगों के होंठों पर दुआएँ थीं- हे रोमांटिक शिरोमणि, शतायु नहीं आप द्वि-शतायु हों. *************************************************************** धरोहर बची तो हैं.. लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में क़दम रखना एक साथ आश्चर्य, ख़ुशी, दुख़ और ग़ुस्से के अनुभव से गुज़रने जैसा होता है.
दुनिया भर की अमूल्य धरोहरें यहाँ इकट्ठा की गई है. ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने उपनिवेशों में जहाँ जहाँ प्राचीन और अमूल्य चीज़ें देखीं, जहाज़ों पर लाद कर लंदन ले आए. यहाँ सिंधु घाटी सभ्यता की कई कलाकृतियाँ हैं तो मिस्र से लाई गई फ़राव के ज़माने की चमत्कृत कर देने वाली अमूल्य मूर्तियाँ. एक वाजिब सवाल उठता है --आख़िर किस अधिकार से ये चीज़ें यहाँ लाई गईं? क्यों सिंधु घाटी सभ्यता की निशानियाँ भारत-पाकिस्तान की बजाए लंदन में होनी चाहिए? लेकिन जिस तरह ऐतिहासिक वस्तुओं को पूरी गरिमा और हिफ़ाज़त के साथ रखा गया है उसे देखते हुए एक और ख़्याल आता है. कम से कम ये धरोहर अब भी मौजूद तो है जिसे यहाँ आने वाला कोई भी आदमी देख सकता है. नहीं तो क्या पता ये भी रवींद्र नाथ टैगोर को मिले नोबेल पुरस्कार के अमूल्य तमग़े की तरह किसी तस्कर के ख़ज़ाने में पड़ी होतीं. ***************************************************************** दुर्गा पूजा का नज़ारा इन दिनों ब्रिटिश म्यूज़ियम में एक अद्भुत नज़ारा देखने को मिलता है. पश्चिम बंगाल के नदिया ज़िले के गाँवों से बुलाए गए कलाकार यहाँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने में लगे हुए हैं.
ठीक वैसी ही जैसी दुर्गा पूजा के दौरान बंगाल में बनाई जाती हैं और फिर नदियों में उनका विसर्जन कर दिया जाता है. पूरे बंगाली ठाठ का कुरता-पायजामा पहने निमाई बाबू आजकल ब्रिटिश म्यूज़ियम आने वाले लोगों के लिए कौतूहल का विषय बने हुए हैं. जौ की पुआल और बालियों को सुतली से बाँधकर वो गणेश और दुर्गा की प्रतिमाओं का ढाँचा बना रहे हैं. इन ढाँचों पर फिर मिट्टी चढ़ाई जाएगी और फिर रंग किया जाएगा. सबसे अंत में दुर्गा की आँखें, जिनके कारण उन्हें विशालाक्षी भी कहा जाता है, बनाई जाएँगी. और फिर परंपरा का निर्वाह करते हुए इन मूर्तियों को लंदन की टेम्स नदी में विसर्जित कर दिया जाएगा. पूरब के दर्शन की सांकेतिकता को कभी क्या पश्चिम समझ पाएगा? |
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