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चल वे बुल्लया ओथे चलिए.... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अनीश आहलूवालिया की दिल्ली डायरी पढ़ी. दिल्ली के सिनेमाघरों में दर्शकों की लंबी क़तारें देखीं तो सोचा लंदन और दिल्ली को आमने सामने खड़ा कर दूँ. इतवार को 'कैंक' यानी 'कभी अलविदा न कहना' देखने गई. मेरे साथ एक बंगाली मित्र भी थीं. शाम का शो था. फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद यह दूसरा वीकेंड था और हाउस फ़ुल. ब्रिटेन भर में फ़िल्म 60 सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई और सभी जगह यही हाल था. लंबी-लंबी क़तारें देख कर कुछ हैरानी हुई और कुछ खुशी. हैरानी इसलिए कि यह नज़ारा बहुत दिनों के बाद देखा. और ख़ुश होने की दो वजहें थीं. पहली यह कि शुक्र है कि टिकट पहले से बुक किए थे. दूसरी यह कि शायद फ़िल्म देखने के बाद पैसे ज़ाया होने का एहसास नहीं होगा.... लेकिन पैसे की छोड़िए. एक छत के नीचे, पॉप कॉर्न खाते हुए, कोला पीते हुए इतने सारे लोग जब बेवजह हँसते हैं या बेवजह आँसू बहाते हैं तो लगता है आप अकेले नहीं है. फ़िल्म कैसी लगी इसका जवाब मेरी बंगाली मित्र ने यूँ दिया- “माँ गो कितना लंबा छवि था, ऐसा लगा सत्यजीत रे की अप्पू सिरीज़ का तीनों फ़िल्म एक शो में देखा. ऐनीवे गुड फ़न था बट स्टोरी, कैरेक्टरर्स सब कितना अनकनविंसिंग और यह तो हमको बिल्कुल समझ नहीं आया कि फ़िल्म न्यूयॉर्क में क्यों बेस्ड था और रानी मुखर्जी अभिषेक बच्चन से इतना अनहैप्पी क्यों था? नो लॉजिक” लेकिन लॉजिक की फ़िक्र किसे है और क्यों हो? ब्रिटिश एशियन के लिए बॉलीवुड की फ़िल्में उसके कल्चर का हिस्सा हैं. और इस बात को बॉलीवुड के प्रोड्यूसर-डायरेक्टर-डिस्ट्रीब्यूटर अच्छी तरह समझते हैं. मुझे याद है लगभग दो दशक पहले, जब मैं नई-नई लंदन आई थी, तब शायद किसी इक्के दुक्के छोटे से सिनेमाघर में हिंदी फ़िल्म लगती थी. वो भी कभी कभार! आज हर नई फ़िल्म यूके और भारत में एक साथ रिलीज़ होती है. यही नहीं पिछले वर्ष टॉप टेन चार्ट में जहाँ ब्रिटेन की सात फ़िल्में पहुँची वहीं बॉलीवुड की नौ. इसका मतलब यह मत निकालिएगा कि ब्रिटेन में सिर्फ़ बॉलीवुड या ब्रितानी फ़िल्मों का राज है. पूरे यूरोप की तरह यहाँ भी हॉलीवुड का वर्चस्व है. बॉलीवुड फ़िल्में यूके में कितना अच्छा बिज़नेस करती हैं.. ..यह कहानी फिर सही. असल बात यह कि ‘लॉजिक’ढूँढने वाले हम जैसे कुछ मुठ्ठी भर लोग यह भूल जाते हैं कि ज़्यादातर लोगों के लिए बॉलीवुड फ़िल्में एक तरह का ‘फ़ायर एस्केप हैं. जब तनाव बढ़े, आसपास की दुनिया बेक़ाबू और बर्दाश्त से बाहर लगने लगे-बॉलीवुड की दुनिया में थोड़ी देर के लिए पनाह ले लो. भारत हो या ब्रिटेन- संघर्ष और तनाव कहाँ नहीं है! *********************************************** ‘शब्दों का आतंक’
यहाँ पिछले कुछ दिनों से सिर्फ़ आतंक और षड्यंत्र जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं. सच मानिए- शब्दों का आतंक कहीं ज़्यादा घातक होता है. इस आतंक का साया लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर भी दिखाई दिया. हीथ्रो हवाई अड्डा- जहाँ से लगभग दो लाख लोग रोज़ दुनिया के अलग-अलग आसमानों के लिए उड़ान भरते हैं, अचानक दिल्ली का रेलवे स्टेशन बन गया! उड़ानें रद्द हुईं और छुट्टियाँ बेरंग हुईं. लेकिन ज़ाहिर है जान छुट्टियों से ज़्यादा प्यारी है. हीथ्रो हवाई अड्डे पर नए नियम लागू हुए. इधर सरकार ने ब्रिटेन के हवाईअड्डों पर यात्रियों की ‘प्रोफ़ाइलिंग’ करने का एक प्रस्ताव रखा. यानी ऐसे यात्रियों को रोककर पूछताछ की जाए जो ‘संदिग्ध’ लगें. क्योंकि कथित साज़िश के सिलसिले में गिरफ़्तार होने वाले दक्षिण एशियाई मूल के लोग हैं, इसलिए प्रोफ़ाइलिंग करते समय दक्षिण एशियाई चेहरों को ही ज़्यादा संदिग्ध समझा जाएगा. मगर क्या हर भारतीय, पाकिस्तानी, श्रीलंकाई, बांग्लादेशी या मुसलमान आतंकवादी है? क्या हममें से हरेक का चेहरा अब संदेह के दायरे में होगा? पिछले हफ़्ते की ही बात है. मोनार्क एयरलाइंस की एक उड़ान के दो एशियाई युवकों को विमान से उतार दिया गया. दोनों मैनचैस्टर के रहने वाले थे. क्यों उतार दिया गया? क्योंकि वे संदिग्ध थे? भारत-पाकिस्तान जैसे देशों के लग रहे थे. सबसे तकलीफ़ की बात यह कि यह फ़ैसला सुरक्षा एजेंसियों ने नहीं किया. बल्कि डेढ़ सौ यात्रियों ने इन युवकों को अपने साथ विमान में यात्रा करने से रोक दिया. ज़ाहिर है जान सबको प्यारी है. और अधिकारियों पर सबकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है. लेकिन प्रोफ़ाइलिंग का अधिकार क्या अब यात्रियों को होगा? इन्हीं सवालों के बीच मुझे ‘कभी अलविदा न कहना’ देखने वालों की लंबी क़तारें याद आईं तो लगा कि आतंकवाद, युद्ध, जातिवाद जैसी समस्याओं से परे एक दुनिया बॉलीवुड की है जहाँ तीन घंटों के लिए राहेफ़रार मिल जाती है. और फिर प्रोफ़ाइलिंग का भी डर नहीं. बुल्ले शाह की पंक्तियाँ याद आ गईं- चल वे बुल्लया ओथे चलिए, जित्थे सारे अन्ने ये डायरी आपको कैसी लगी आप hindi.letters@bbc.co.uk पर अपनी राय भेज सकते हैं. |
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