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शुरुआत एक भूमिका से... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के लंदन दफ़्तर में हम जितने लोग भी काम करते हैं उनमें एक बात समान है. हम सब की जन्मभूमि भारत है. चाहे वह दिल्ली हो, बिहार हो या फिर पंजाब, राजस्थान या उत्तर प्रदेश. लेकिन हम सब की कर्मभूमि लंदन है. हममें से कुछ यहाँ दो साल से हैं तो कुछ बीस साल से. हमारे अनुभव अलग हैं और हमारी खट्टी-मीठी यादें जुदा. इस डायरी के माध्यम से हम आपको दिखाना चाहते हैं वह लंदन जो हम देख पा रहे हैं. इस डायरी के ज़रिए हर सप्ताह अलग-अलग सहयोगी आपसे संबोधित होंगे. कुछ यही अंदाज़ होगा दिल्ली डायरी का जिसकी पहली प्रति आप तक पहुँच चुकी है. हम आपकी प्रतिक्रियाएँ चाहेंगे और साथ ही आपके सुझाव भी. तो लिखिएगा ज़रूर...हमारा पता hindi.letters@bbc.co.uk * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * भयावह इमारतें... लंदन में एक अजीब तरह की प्रतियोगिता जारी है.
सरकार को इमारतों के निर्माण के बारे में सलाह देने वाली एक संस्था ने लोगों से कहा है कि वे उन इमारतों की तस्वीरें भेजें जो उनकी नज़र में स्थापत्य का सबसे ख़राब नमूना हैं. शायद संस्था भविष्य के लिए उनसे कुछ सबक़ सीखना चाहती है. वैसे संस्था का कहना है कि लोग इमारतों को जब देखते हैं तो अपने आसपास के माहौल को भूल कर उन्हीं के बारे में सोचने लगते हैं. इन इमारतों का अध्ययन करके संस्था यह नतीजा भी निकालना चाहती है कि ख़राब डिज़ायन पर कितनी राशि ख़र्च की जाती है. अब तक जो प्रविष्टियाँ आई हैं उनमें लंदन का सेटंरपॉएंट टावर शामिल है. क्या आपको अपने शहर की कुछ इमारतें याद आ रही हैं..? * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * लंदन में अंग्रेज़ फॉरनर... लंदन में एक इलाक़ा है साउथॉल. वहाँ जाते ही करोल बाग़. चाँदनी चौक या लाजपत नगर की याद ताज़ा हो जाती है.
हर माल मिलेगा दो रुपये की तर्ज़ पर यहाँ भी फ़ुटपाथ पर दुकानें लगती हैं. यह और बात है कि यहाँ माल दो रुपये में नहीं दो पाउंड में मिलेगा. सड़क पर निकल जाइए, देखने को मिलेंगे दुकानों की खिड़कियों में साड़ी और शलवार-कमीज़ में सुसज्जित मैनेक्वींस, कैसेट की दुकानों में ज़ोर-ज़ोर से बजते हिंदी और पंजाबी गाने और चूड़ियों और बिंदियों के स्टॉल. बहरहाल, यहाँ पंजाबी समुदाय की भरमार है. और इसी से जुड़ा एक क़िस्सा मशहूर है. कहते हैं कि जब यहाँ एशियाइयों की तादाद बढ़ी तो यहाँ रहने वाले कई अंग्रेज़ अपने मकान बेच कर कहीं और जा बसे. एक दिन एक डाकिया किसी का पता पूछता फिर रहा था. एक पंजाबी भाई ने आगे बढ़ कर पूछा और सुनने के बाद कुछ सोच में पड़ गए. फिर बोले, "जॉन स्मिथ..? इथ्थे तो कोई फ़ॉरनर नहीं रहंदा है". |
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