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खुशनुमा मौसम ने बदला लंदन का मिज़ाज | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मौसम आपके मूड पर किस क़दर असर डालता है इसकी ताज़ा मिसाल आजकल लंदन में देखी जा सकती है. इन दिनों लंदन में गर्मी का मौसम है. आमतौर पर सर्द माने जाने वाले ब्रिटेन में जहाँ तापमान 8 से 12 डिग्री सेल्सियस रहता है, वहीं इन दिनों तापमान 24-25 के आसपास है. दिन में सूर्य देवता के दर्शन होते हैं, खिली-खिली धूप रहती है और सड़कों पर अक़्सर लोगों के हँसते-खिलखिलाते चेहरे देखे जा सकते हैं. देर रात तक गली-चौराहों और क्लबों में चहल-पहल देखने को मिलती है और इसके ठीक उलट सर्दियों में जब तामपान कभी-कभी 1-2 डिग्री सेल्सियस भी होता है, तो दिन ढलते ही सड़कें लगभग सूनी हो जाती हैं. लोगों के चेहरे उदास तो नहीं पर कुछ बुझे-मुरझाए से होते हैं. कपड़ों के रंगों में भी फ़र्क देखने को मिलता है. सर्दियों में जहाँ ज़्यादातर काले-भूरे ओवरकोट पहने लोग देखे जा सकते हैं वहीं आजकल चटकदार और रंग-बिरंगे लिबास में लोग आपको सड़कों पर मिलेंगे. सो गर्मियों का भरपूर मज़ा उठा रहे हैं लोग. उठाए भी क्यों न- ये ख़ुशनुमा मौसम चंद महीनों के लिए ही नसीब होता है ब्रिटेनवासियों को. वैसे कभी-कभी सोचती हूँ कि यहाँ से अलग-भारत में गर्मियों की लू, सर्दी की ठिठुरन, भीगी-भीगी बरसात, बसंत की बहार.. मौसम के कितने ही रंग देखने को मिल जाते हैं लोगों को. ********************************************* परदेस में इंडिया...हाउस पहली लंदन डायरी में इमरातों का ज़िक्र किया गया था. सवाल था क्या आपको अपने शहर की कुछ इमारतें याद आ रही हैं..? वैसे तो लंदन में ख़ूबसूरत इमारतों की भरमार है. लेकिन मुझे एक विशेष इमारत बेहद पसंद है- इंडिया हाउस यानी लंदन में भारतीय उच्चायोग. इंडिया हाउस देखने में बड़ी साधारण सी इमारत है. लेकिन इसे पसंद करने की वजह मेरे लिए ख़ास है. इंडिया हाउस बीबीसी कार्यालय के बगल में है. जब इस शहर में नई-नई थी तो बस से दफ़तर आते समय हमेशा डर लगा रहता था कि ग़लत जगह न उतर जाऊँ. तब शहर के किसी गली, किसी कूचे-नुक्कड़ से बिल्कुल अपरिचित थी. एक अजीब सा अजनबीपन था. लेकिन बस में बैठी जब दूर से ही मैं इंडिया हाउस की इमारत देखती थी तो मन को एक तसल्ली मिलती थी. पहली तसल्ली तो ये कि मैं ठीक जगह पर पहुँची हूँ क्योंकि इंडिया हाउस के पास ही बीबीसी का दफ़्तर है. और दूसरा ये कि नए और अजनबी देश में आने के बाद जब इंडिया हाउस की इमारत दिखती थी तो जैसे परदेस में भी देस की यादें ताज़ा हो जाती थीं. सो इस इमारत को पसंद करने की वजह है तो बहुत छोटी सी लेकिन जैसा कि गीतकार योगेश ने आनंद फ़िल्म के एक गाने में लिखा है- छोटी-छोटी बातों की हैं यादें बड़ी, भूले नहीं बीती हुई एक छोटी घड़ी...... *********************************************** अरब संस्कृति का झरोखा
लोकल बसों में सफ़र करना किसी भी शहर को जानने-समझने का एक बेहतरीन तरीक़ा होता है. लंदन में अक्सर बस के ज़रिए ऐजवेयर रोड नामक मार्ग से आना-जाना होता है. बस की खिड़की से बैठे-बैठे रोज़ाना इस इलाक़े को बारीकी से देखने का मौक़ा मिलता है. इस अरब बहुल क्षेत्र का माहौल बेहद ही दिलचस्प रहता है. यहाँ सड़क किनारे सजी दुकानों में शाम को अक्सर गपशप करते अरब लोगों को शीशा पीते हुए देखा जा सकता है. शीशा कुछ-कुछ भारतीय हुक्के जैसा होता है. हुक्के के इर्द गिर्द बैठकर होने वाली चौपाल की तरह ही यहाँ भी शीशे के इर्द गिर्द मजमा लगता है. इत्र की भी यहाँ कई दुकानें हैं जिन्हें नक्काशेदार शीशियों में रखकर बड़े ही करीने से सजाया जाता है. इत्र ख़रीदने की हसरत से एक बार मैं एक दुकान तक गई. लेकिन अरब देशों से लाई गईं इत्र की इन छोटी-छोटी शीशियों की क़ीमत ऐसी कि बस सूंघकर ही दिल को तसल्ली देनी पड़ी. हाँ, यहाँ मध्य पूर्व के कई देशों के पकवान भी आपको मिल जाएँगे. इन्हें चखने का मौक़ा तो अभी तक नहीं मिला है पर दूर से काफ़ी लज़ीज लगते हैं ये पकवान. कुल मिला कर कहूँ तो लगता है कि अरब खान-पान, पहनावा और उनकी संस्कृति की एक तस्वीर रोज़ खिंच जाती है मेरे सामने- बस की खिड़की के ज़रिए. |
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