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कूड़े-कचरे पर टैक्स? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन में आजकल कर व्यवस्था में सुधार की चर्चा चल रही है. अगर सुझावों पर सहमति हो गई तो लोगों को कूड़े-कचरे पर भी टैक्स देना पड़ सकता है. प्रस्ताव ये है कि काउंसिल टैक्स से अलग एक पर्यावरण कर लगाया जाए. इसके लिए जो जितना कूड़ा-कचरा इकट्ठा करेगा, उसे उतना ही टैक्स देना पड़ेगा. अब कौन-कितना कूड़ा इकट्ठा करता है, इसकी पड़ताल कैसे हो. तो भई, इसका निदान भी हाज़िर है. प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि कूड़ा-कचरा इकट्ठा करने वाले सरकारी कर्मचारी उसका वजन भी करेंगे और फिर उस हिसाब से लोगों को ये ख़ास क़िस्म का कर देना पड़ेगा. प्रस्ताव के पक्षधर ये तर्क दे रहे हैं कि कई यूरोपीय देशों में पहले से ही ये व्यवस्था है और अगर साफ़-सफ़ाई और बेहतर व्यवस्था लोग चाहते हैं, तो उन्हें क़ीमत तो अदा ज़रूर करनी होगी. * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * परेदस में माँ
मेरे एक मित्र लंदन आ रहे थे. मैं उन्हें लेने लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे गया. फ़्लाइट दिल्ली से आ रही थी. इसलिए आने वालों की बाट जोहने वालों में बड़ी संख्या में भारतीय चेहरे भी थे. लेकिन अपने परिजनों और मित्रों का इंतज़ार कर रहे लोगों के बीच ढेर सारे सामान और एक-दो लोगों के साथ एक महिला ऐसी भी थी. जिसे आने वाले का नहीं, उसे आकर ले जाने वाले का इंतज़ार था. दिल्ली से आने वाला विमान अभी आया ही था. मुझे पता था कि अभी औपचारिकताएँ पूरी करने में समय लगेगा. इसलिए मैं थोड़ी देर के लिए वहाँ से निकल गया. थोड़ी देर बाद जब मैं वहाँ लौटा तो देखा कि वो परेशान महिला एक लड़के की सहायता से टेलीफ़ोन कर रही थी. उसे इंतज़ार था अपने बेटे का, जो उसे लेने नहीं आया था. बातचीत में पता चला कि वो काफ़ी देर से हवाई अड्डे पर अपने बेटे का इंतज़ार कर रही है. जब घंटों तक उनके पुत्र हवाई अड्डे पर नहीं पहुँचे, तो उन्होंने फ़ोन करने की ठानी. फ़ोन करने पर पता चला कि उनके बेटे अभी कहीं व्यस्त हैं. माँ को आस बँधी, चलो बेटा आएगा ही भले ही लंबे इंतज़ार के बाद. उनका इंतज़ार कितना लंबा रहा. ये तो नहीं पता. लेकिन सोचता हूँ, परदेस में आकर क्या वाकई हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपनी माँ के लिए भी हमें फ़ुरसत नहीं. * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * अंतत: फ़ुटबॉल का बुख़ार
फ़ुटबॉल का बुख़ार इस समय चरम पर है. इंग्लैंड की बात ही क्या. बड़े अनोखे होते हैं यहाँ के फ़ुटबॉल प्रशंसक. कुछ भी कर देंगे. हुड़दंगियों की भी एक जमात है. ख़ैर बात इंग्लिश प्रशंसकों से अलग. जापान और ब्राज़ील का मैच चल रहा था. बीबीसी क्लब में बैठकर मैं दफ़्तर के कई सहयोगियों के साथ बड़ी स्क्रीन पर मैच का आनंद ले रहा था. हाफ़ टाइम के बाद हम एक रेस्तरां में चले गए. सोचा, ऐसे मौक़े पर यहाँ तो ख़ास व्यवस्था होगी ही. जगह ज़रूर मिलेगी और मैच भी. ब्राज़ील का मैच देखने की तमन्ना लिए हमलोग वहाँ पहुँचे. लेकिन वहाँ पता चला कि रेस्तरां के दोनों टीवी सेट पर ऑस्ट्रेलिया और क्रोएशिया का मैच चल रहा था. हमलोगों ने अपनी आवाज़ बुलंद की और कहा हमें जापान और ब्राज़ील का मैच देखना है. रेस्तरां के काउंटर पर बैठे एक व्यक्ति ने कहा कि उनके पास एक ही सेट टॉप बॉक्स है यानी दोनों टीवी पर वे एक ही मैच दिखा सकते हैं. अभी हम लोग कुछ कह पाते. इससे पहले ही वहाँ बड़ी संख्या में मौजूद लोगों ने चिल्ला कर कहा- वी आर ऑस्ट्रेलियन माइट.........अब हमारे पास ऑस्ट्रेलिया की जीत पर तालियाँ पीटने के सिवा कोई चारा नहीं था. हाँ, हमारे सहयोगी नलिन कुमार की कृपा से हमें दूसरे हाफ़ में ब्राज़ील की ओर से लगाए जा रहे गोल का ब्यौरा ज़रूर मिल रहा था. (हमारी साप्ताहिक लंदन डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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