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ज़िंदगी फिर भी चलती रहती है.....

धमाकों की शिकार एक बस
वो सात जुलाई की सुबह थी. मालूम नहीं था कि ये सुबह इतिहास में काले दिन के रूप में दर्ज होने जा रही है. मेरी सुबह 10 बजे की शिफ़्ट थी.

अभी घर से दफ़्तर के लिए निकला नहीं था, तभी दफ़्तर से हमारे सहयोगी अपूर्व कृष्ण का फ़ोन आया. अपूर्व ने बताया कि कुछ मेट्रो लाइन पर गड़बड़ी चल रही है. इसलिए पूरी जानकारी लेने के बाद ही मैं दफ़्तर के लिए चलूँ.

अपूर्व को दफ़्तर आते समय मुश्किल हुई थी. लेकिन उस समय तक जानकारी बहुत सीमित थी. पहले जो जानकारी रिस कर सामने आई. उससे लगता था कि किसी लाइन पर इलेक्ट्रिक सर्किट के कारण समस्या आई है.

उत्सुकतावश मैंने भी टेलीविज़न ऑन किया. ब्रेकिंग न्यूज़ चल रहा था. एक लाइन में कुछ गड़बड़ी की बातें चल रहीं थी. लेकिन उस समय तक अंदाज़ा नहीं था कि स्थिति इतनी भयावह है.

मैं सोच ही रहा था कि दफ़्तर रवाना होने के बारे में मेट्रो ट्रेन की वेबसाइट से कुछ जानकारी ली जाए, तभी समाचार में कुछ अन्य मेट्रो लाइन पर गड़बड़ियों की ख़बर आने लगी.

उसके बाद तो धीरे-धीरे घटना की भयावहता का अंदाज़ा मिलने लगा. कई मेट्रो ट्रेन में धमाके हुए थे और एक बस में भी विस्फोट हुआ था.

भारत से परिजनों और शुभचिंतकों के लगातार फ़ोन आ रहे थे. कुशलता पूछी जा रही थी.

हमारी संपादक सलमा ज़ैदी भी लगातार संपर्क में थी. बस सेवा और मेट्रो सेवा पूरी तरह रोक दी गई थी. हमारे पास कोई चारा नहीं था कि हम दफ़्तर के लिए रवाना हो पाए.

एक कटु सच ये भी है कि ऐसी घटनाओं के दौरान हम पत्रकारों का भी 'एसिड टेस्ट' होता है. काम का. मानसिक मुश्किलों के बावजूद हमें लोगों तक सही और सच्ची सूचना पहुँचाने का भी ज़िम्मा होता है.

हमारे जो सहयोगी दफ़्तर पहुँच गए थे. उन्होंने इस काम को बख़ूबी अंजाम दिया.लेकिन हम चाह कर भी दफ़्तर नहीं जा पाए.

दूसरे दिन दफ़्तर के लिए रवाना हुए तो माहौल में अजीब सी शांति थी. लेकिन समय के साथ अब सब कुछ सामान्य हो गया है.

सात जुलाई की घटना को एक साल हो गए हैं. बुश हाउस, मेट्रो ट्रेन और यहाँ की बसों के बीच दिनचर्या जारी है. कहते हैं न कि ज़िंदगी फिर भी चलती रहती है.........

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